UP Board Class 12 Chemistry 5. रसायन is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. Class 12 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
हल:
हल: भौतिक अधिशोषण एक ऊष्माक्षेपी प्रक्रम है।
हल: क्रिस्टलीय रूपों की तुलना में चूर्णित पदार्थ अधिशोषण के लिए अधिक पृष्ठीय क्षेत्रफल उपलब्ध कराते हैं, यही कारण है कि अधिशोषण के लिए क्रिस्टलीय रूपों की तुलना में महीन चूर्ण अधिक प्रभावी है।
हल: हॉबर प्रक्रम में कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), लौह उत्प्रेरक तथा उत्प्रेरक वर्धक मॉलिब्डेनम के लिए विष का कार्य करती है अर्थात् उत्प्रेरक तथा उत्प्रेरक वर्धक की क्षमता घट जाती है। यह Fe से संयोग करके लौह कार्बोनिल, Fe(CO)5 बनाती है जो अमोनिया के उत्पादन में व्यवधान उत्पन्न करता है। अतः अभिक्रिया मिश्रण में से CO को हटाना आवश्यक है।
हल: एस्टर के जल-अपघटन की रासायनिक समीकरण निम्न प्रकार है:
हल: विशोषण के फलस्वरूप उत्प्रेरक के तल पर बने उत्पाद, तल से अलग हो जाते हैं। इस प्रकार अन्य अभिकारक अणुओं को तल उपलब्ध कराते हैं।
हल: हार्डी-शुल्जे नियम के अनुसार, कोलॉइडी कणों के आवेश के विपरीत आवेश वाले आयन इनके आवेश को उदासीन कर देते हैं जिसके परिणामस्वरूप इनका स्कंदन या अवक्षेपण हो जाता है। लेकिन वास्तव में आयन इनके आवेश को उदासीन करते हैं अतः इन आयनों वाले सॉल का भी स्कंदन हो जाता है। अतः हार्डी-शुल्जे नियम में निम्न प्रकार संशोधन किया जा सकता है: "दो विपरीत आवेश वाले कोलॉइडी विलयनों को समान मोलों के अनुपात में मिलाने पर इन पर उपस्थित आवेशों का पारस्परिक उदासीनीकरण होने से स्कंदन हो जाता है।"
हल: आयनिक अभिक्रिया में बनने वाले अवक्षेप के कणों के तल पर कुछ अभिकारक आयन अधिशोषित या चिपके हो सकते हैं। इन आयनों को हटाने के लिये अवक्षेप को जल से धोना आवश्यक है। ऐसा ना करने पर अवक्षेप के मात्रात्मक आकलन में त्रुटि हो सकती है।
हल:
| अधिशोषण | अवशोषण |
|---|---|
| 1. यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके फलस्वरूप एक पदार्थ दूसरे पदार्थ के केवल पृष्ठ पर सान्द्रित होता है। | 1. यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके फलस्वरूप एक पदार्थ दूसरे पदार्थ के संपूर्ण आयतन में समान रूप से वितरित हो जाता है। |
| 2. अधिशोषक के पृष्ठ पर सान्द्रता (अधिशोष्य की), सम्पूर्ण स्थूल की तुलना में भिन्न होती है। यह पृष्ठीय परिघटना है। | 2. सान्द्रता ठोस के संपूर्ण स्थूल में समान रहती है। यह संपूर्ण स्थूल में होने वाली परिघटना है। |
| 3. अधिशोषण प्रारम्भ में तीव्र होता है इसके पश्चात पृष्ठ उपलब्ध न होने के कारण धीमा हो जाता है। | 3. अवशोषण समान गति से होता है। |
| उदाहरण: सिलिका जेल पर जल वाष्प का अधिशोषण। | उदाहरण: शुष्क कैल्सियम क्लोराइड द्वारा जल वाष्प का अवशोषण। |
हल:
| भौतिक अधिशोषण | रासायनिक अधिशोषण |
|---|---|
| 1. यह वान्डरवाल्स बलों के कारण उत्पन्न होता है। | 1. यह रासायनिक बंध बनने के कारण होता है। |
| 2. इसकी प्रकृति विशिष्ट नहीं होती है। | 2. इसकी प्रकृति अतिविशिष्ट होती है। |
| 3. यह उत्क्रमणीय प्रक्रम है। | 3. यह अनुत्क्रमणीय प्रक्रम है। |
| 4. अधिशोषण की एन्थैल्पी कम होती है (लगभग 20-40 kJ mol-1)। | 4. अधिशोषण की एन्थैल्पी उच्च होती है (लगभग 80-240 kJ mol-1)। |
| 5. यह गैस की प्रकृति पर निर्भर करता है। अधिक आसानी से द्रवणीय गैसें सहजता से अधिशोषित होती हैं। | 5. यह भी गैस की प्रकृति पर निर्भर करता है। वे गैसें जो अधिशोषक से क्रिया कर सकती हैं, रासायनिक अधिशोषण दर्शाती हैं। |
| 6. भौतिक अधिशोषण के लिए निम्न ताप सहायक होता है। | 6. रासायनिक अधिशोषण के लिए उच्च ताप सहायक होता है। |
| 7. इसमें सामान्यतः सक्रियण ऊर्जा की आवश्यकता नहीं होती है। | 7. कभी-कभी उच्च सक्रियण ऊर्जा की आवश्यकता होती है। |
| 8. उच्च दाब पर अधिशोषक के पृष्ठ पर यह बहुअणुक परतों के रूप में परिणामित होता है। | 8. यह एकल अणुक परत के रूप में फलित होता है। |
हल: सूक्ष्म विभाजित पदार्थ अधिक प्रभावशाली अधिशोषक है क्योंकि:
(i) पृष्ठीय क्षेत्रफल अधिक होने से अधिशोषण का परिमाण बढ़ता है।
(ii) सक्रिय केन्द्रों की संख्या अधिक होने से अधिशोषण का परिमाण बढ़ जाता है।
हल: किसी ठोस पर गैस के अधिशोषण को प्रभावित करने वाले कारक इस प्रकार हैं:
(i) गैस की प्रकृति
(ii) अधिशोषक का पृष्ठीय क्षेत्रफल
(iii) दाब
(iv) ताप
(v) अधिशोषक की सक्रियता
हल: अधिशोषक द्वारा अधिशोषित गैस की मात्रा में स्थिर ताप पर दाब के साथ परिवर्तन एक वक्र के माध्यम से व्यक्त किया जा सकता है, जिसे अधिशोषण समतापी वक्र कहते हैं। अधिशोषण समतापी वक्र दो प्रकार के होते हैं:
(i) फ्रॉयन्डलिक समतापी वक्र
(ii) लैंगमूर समतापी वक्र।
फ्रॉयन्डलिक समतापी वक्र: फ्रॉयन्डलिक ने ठोस अधिशोषक के इकाई द्रव्यमान द्वारा एक निश्चित ताप पर अधिशोषित गैस की मात्रा (x/m) तथा दाब (p) के मध्य एक प्रयोगाश्रित संबंध दिया। इस संबंध को निम्न समीकरण द्वारा व्यक्त किया जा सकता है:
हल: अधिशोषक के सक्रियण का अर्थ है, अधिशोषक की अधिशोषण शक्ति को बढ़ाना। यह अधिशोषक के पृष्ठीय क्षेत्रफल को बढ़ाकर किया जा सकता है जिसे निम्न प्रकार प्राप्त किया जा सकता है:
(i) अधिशोषित गैसों को हटाकर अर्थात् लकड़ी के चारकोल को निर्वात में या अति उच्चतापीय भाप में 650 K से 1330 K ताप के मध्य गर्म करके सक्रिय किया जा सकता है।
(ii) अधिशोषक को छोटे टुकड़ों में तोड़कर।
(iii) अधिशोषक के पृष्ठ को रफ (ऊबड़-खाबड़) बनाकर।
हल: सामान्यतः विषमांगी उत्प्रेरण में, अभिकारक गैसीय जबकि उत्प्रेरक ठोस अवस्था में होते हैं। अभिकारक अणुओं का ठोस उत्प्रेरक के पृष्ठ पर भौतिक या रासायनिक अधिशोषण द्वारा अधिशोषण हो जाता है। अभिकारक अणुओं की सान्द्रता बढ़ने से या ठोस उत्प्रेरक के पृष्ठ पर अभिकारक अणुओं के टूटकर सक्रिय स्पीशीज बनने से, जोकि तीव्रता से अभिक्रिया करती है, अभिक्रिया की गति बढ़ जाती है। उत्पाद अणुओं का विशोषण हो जाता है और अब उत्प्रेरक सतह दोबारा अधिक अभिकारक अणुओं को अधिशोषित करने के लिए उपलब्ध हो जाती है। यह सिद्धान्त विषमांगी उत्प्रेरण का अधिशोषण सिद्धान्त कहलाता है।
हल: जब किसी ठोस के पृष्ठ पर गैस का अधिशोषण होता है तो इसकी (गैस की) एन्ट्रॉपी घट जाती है अर्थात् ΔS ऋणात्मक हो जाता है। समीकरण ΔG = ΔH - TΔS के आधार पर किसी प्रक्रम के स्वतः प्रवर्तित होने के लिये मुक्त ऊर्जा (गिब्स ऊर्जा) ΔG का मान ऋणात्मक होना चाहिए। क्योंकि ΔS का मान ऋणात्मक है अतः ΔG ऋणात्मक तभी हो सकता है जबकि ΔH का मान पर्याप्त ऋणात्मक हो। इस प्रकार अधिशोषण हमेशा ऊष्माक्षेपी (ΔH ऋणात्मक) होता है।
हल: परिक्षिप्त प्रावस्था तथा परिक्षेपण माध्यम की भौतिक अवस्थाओं (ठोस, द्रव अथवा गैस) के आधार पर निम्नलिखित आठ प्रकार के कॉलॉइडी निकाय बनते हैं:
| क्र. | परिक्षिप्त प्रावस्था | परिक्षेपण माध्यम | कोलॉइड निकाय का नाम | उदाहरण |
|---|---|---|---|---|
| 1. | ठोस | ठोस | ठोस सॉल | रत्न, प्रस्तर |
| 2. | ठोस | द्रव | सॉल | प्रलेप (पेंट), तरल स्याही |
| 3. | ठोस | गैस | एरोसॉल | धुआँ, धूल |
| 4. | द्रव | ठोस | जेल | पनीर, मक्खन, जेली |
| 5. | द्रव | द्रव | इमल्शन (पायस) | दूध, बालों की क्रीम |
| 6. | द्रव | गैस | एरोसॉल | धुंध, कोहरा, बादल, कीटनाशक स्प्रे |
| 7. | गैस | ठोस | ठोस सॉल | प्यूमिस पत्थर, फोम रबर |
| 8. | गैस | द्रव | फोम | फेन, फैंटी गई क्रीम, साबुन के झाग |
हल:
अधिशोषण पर दाब का प्रभाव: निश्चित ताप पर, ठोस अधिशोषक सतह की दी गई मात्रा द्वारा अधिशोषित गैस की मात्रा (x/m), गैस के दाब (p) बढ़ने के साथ बढ़ती है। स्थिर ताप पर x/m तथा गैस के दाब p के बीच बनाया गया वक्र अधिशोषण समतापी वक्र कहलाता है। फ्रॉयन्डलिक समतापी वक्र की सहायता से दाब के प्रभाव की व्याख्या की जा सकती है।
(i) दाब के निम्न परिसर में, x/m लगाये गये दाब के अनुक्रमानुपाती होता है। (x/m ∝ p)
(ii) दाब के उच्च परिसर में, x/m स्थिरांक अर्थात् अधिशोषण दाब से स्वतंत्र होता है। (x/m ∝ p⁰)
(iii) दाब के माध्यमिक परिसर में, x/m ∝ p1/n अर्थात् अधिशोषण दाब के गुणक 1/n के अनुक्रमानुपाती होता है, जहाँ n > 1।
अधिशोषण पर ताप का प्रभाव: अधिशोषण सामान्यतः ताप द्वारा प्रभावित होता है। ऊष्माक्षेपी होने के कारण, इसका मान ताप वृद्धि के साथ घटता है। यद्यपि ऊष्माशोषी अवशोषण प्रक्रम में इसका मान ताप वृद्धि के साथ-साथ बढ़ता है।
हल:
द्रवरागी कोलॉइड: उन कोलॉइडी सॉल को जिन्हें परिक्षिप्त प्रावस्था तथा उचित परिक्षेपण माध्यम को सम्पर्क में लाने मात्र से प्राप्त किया जाता है, द्रवरागी (द्रवस्नेही) कोलॉइडी सॉल कहते हैं। ये स्थायी होते हैं। इन्हें उत्क्रमणीय कोलॉइडी सॉल भी कहते हैं क्योंकि कोलॉइडी विलयन में से परिक्षेपण माध्यम को भौतिक विधियों जैसे वाष्पीकरण द्वारा अलग किया जा सकता है।
उदाहरण: गोंद, जिलेटिन, स्टार्च, रबड़ आदि।
द्रवविरागी कोलॉइड: इस प्रकार के सॉल परिक्षिप्त प्रावस्था को परिक्षेपण माध्यम में मिश्रित करने से नहीं बनते। ये स्थायी नहीं होते हैं। ऐसे सॉल को वैद्युत अपघट्य की थोड़ी सी मात्रा मिलाकर, गर्म करके या हिलाकर आसानी से अवक्षेपित या स्कंदित किया जा सकता है। द्रवविरागी सॉल के परिरक्षण के लिए स्थायी कारकों की आवश्यकता होती है।
उदाहरण: गोल्ड सॉल, As2S3 सॉल, Fe(OH)3 सॉल आदि।
द्रवविरागी सॉल के स्कंदन का कारण: सॉल के कणों पर उपस्थित आवेश को हटाकर या आवेश को उदासीन करके द्रवविरागी सॉल का स्कंदन या अवक्षेपण हो जाता है। अर्थात् ये क
UP Board Class 12 Chemistry 5. रसायन Solution is available at our platform https://upboardSolution.com in hindi medium for free of cost. Content provided on our website is free of cost and in PDF format which is easily available for download. Getting the UP Board Solutions for Class 12 will help student to achieve good learning experience so that they can study effectively. UP board holds examination of more than 3 million students every year and majority of the question of exams are from their UP Board Solutions. That’s why it is important to study using the textSolution issued by UP Board.
It is essential to know the importance of UP Board Class 12 Chemistry 5. रसायन textSolution issued by UP Board because students completely rely on these Solutions for their study and syllabus offered by UP Board is so balanced that each student should be aware about the importance of it. Below is the list of Importance of UP Board Class 12 Chemistry 5. रसायन :
There are various features of UP Board Class 12 TextSolutions, some of them are mentioned below so that you student can understand the value and usability of the contend and understand why Uttarpradesh board has prescribed these Solutions.