UP Board class 9 Science 15. खाद्य संसाधनों में सुधार is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. class 9 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
उत्तर 1:
हमारे दैनिक आहार के ये मुख्य घटक हमें विभिन्न प्रकार के पोषक तत्व प्रदान करते हैं:
अनाज (जैसे गेहूँ, चावल, मक्का, बाजरा) हमारे शरीर को कार्बोहाइड्रेट देते हैं, जो ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है।
दालें (जैसे चना, मसूर, अरहर) से हमें शरीर की वृद्धि और मरम्मत के लिए आवश्यक प्रोटीन प्राप्त होता है।
फल (जैसे आम, केला, संतरा) और सब्जियाँ (जैसे पालक, गाजर, टमाटर) हमें विटामिन, खनिज लवण तथा कुछ मात्रा में शर्करा प्रदान करते हैं, जो शरीर की विभिन्न क्रियाओं को सुचारू रूप से चलाने में सहायक होते हैं।
उत्तर 1:
फसल उत्पादन पर जैविक और अजैविक दोनों प्रकार के कारकों का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है:
जैविक कारक: इनमें रोगकारक सूक्ष्मजीव (जीवाणु, कवक, विषाणु), विभिन्न कीट, निमेटोड (सूत्रकृमि) आदि शामिल हैं। ये फसल के पौधों को खाकर, उनमें रोग फैलाकर या उनकी वृद्धि को रोककर उत्पादन क्षमता को कम कर देते हैं।
अजैविक कारक: ये पर्यावरणीय कारक हैं, जैसे सूखा, अत्यधिक वर्षा, पाला, तूफान, मिट्टी की लवणता या अम्लता, तापमान में अत्यधिक वृद्धि या कमी आदि। ये कारक फसल को आंशिक या पूर्ण रूप से नष्ट कर सकते हैं।
उत्तर 2:
फसल सुधार के लिए ऐच्छिक सस्य विज्ञान गुण वे विशेषताएँ हैं जो फसल की देखभाल (प्रबंधन) को आसान बनाती हैं और अधिक उत्पादन में सहायक होती हैं। ये गुण फसल के उद्देश्य के अनुसार अलग-अलग होते हैं।
उदाहरण के लिए, चारे वाली फसलों के लिए लंबी, मजबूत और सघन शाखाएँ वांछनीय गुण हैं ताकि अधिक हरा चारा मिल सके।
अनाज वाली फसलों (जैसे गेहूँ, धान) के लिए बौने पौधे अधिक उपयुक्त होते हैं क्योंकि ये हवा के झोंकों से गिरते नहीं हैं (गिरावट रोधी) और इन्हें कम पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है, जिससे उत्पादन लागत कम होती है और उपज अधिक प्राप्त होती है।
उत्तर 1:
पौधों की वृद्धि के लिए लगभग 16 आवश्यक पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है, जिनमें से अधिकांश पौधे मिट्टी से प्राप्त करते हैं। इनमें से कुछ पोषक तत्वों की पौधों को बहुत अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है, इसीलिए उन्हें वृहत पोषक कहा जाता है।
ये छह वृहत पोषक हैं: नाइट्रोजन (N), फॉस्फोरस (P), पोटैशियम (K), कैल्शियम (Ca), मैग्नीशियम (Mg) और सल्फर (S)। नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटैशियम की आवश्यकता सबसे अधिक होती है, इसलिए इन्हें प्राथमिक वृहत पोषक भी कहते हैं।
उत्तर 2:
पौधे अपने आवश्यक पोषक तत्व तीन प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त करते हैं: वायु, जल और मिट्टी।
| स्रोत | प्राप्त पोषक तत्व |
|---|---|
| वायु | कार्बन (कार्बन डाइऑक्साइड से), ऑक्सीजन |
| जल | हाइड्रोजन, ऑक्सीजन |
| मिट्टी | वृहत पोषक: नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, सल्फर |
| सूक्ष्म पोषक: लोहा (आयरन), मैंगनीज, बोरॉन, जिंक, ताँबा (कॉपर), मॉलिब्डेनम, क्लोरीन |
उत्तर 1:
| खाद | उर्वरक |
|---|---|
| यह एक प्राकृतिक कार्बनिक पदार्थ है जो पौधों और जानवरों के अपशिष्ट (गोबर, पत्तियाँ आदि) के अपघटन से बनता है। | यह एक रासायनिक या अकार्बनिक पदार्थ है जो कारखानों में विभिन्न रसायनों को मिलाकर बनाया जाता है। |
| इसमें पोषक तत्वों की मात्रा कम होती है, लेकिन यह मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ (ह्यूमस) की मात्रा बढ़ाती है। | इसमें विशेष रूप से नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटैशियम जैसे पोषक तत्व उच्च सांद्रता में होते हैं। |
| यह मिट्टी की संरचना, वायु संचार और जल धारण क्षमता में सुधार करती है, जिससे मिट्टी की दीर्घकालिक उर्वरता बनी रहती है। | यह पौधों को तुरंत पोषक तत्व प्रदान करके अल्पकाल में उपज बढ़ाता है, लेकिन मिट्टी की संरचना में सुधार नहीं करता। |
| इसके अधिक उपयोग से कोई हानि नहीं होती और यह पर्यावरण के अनुकूल है। | इसके अत्यधिक व लगातार उपयोग से मिट्टी की उर्वरता कम हो सकती है, जल प्रदूषण हो सकता है और यह मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीवों के लिए हानिकारक हो सकता है। |
| निष्कर्ष: मिट्टी की उर्वरता को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए खाद का उपयोग अधिक लाभदायक है। | निष्कर्ष: त्वरित वृद्धि और अधिक उपज के लिए उर्वरक उपयोगी हैं, परन्तु इनका संतुलित व सावधानीपूर्वक उपयोग आवश्यक है। |
उत्तर 1:
सबसे अधिक लाभ परिस्थिति (ग) में होगा, अर्थात जब किसान अच्छी किस्म के बीज का प्रयोग करें, सिंचाई करें, उर्वरक का उपयोग करें तथा फसल सुरक्षा की विधियाँ अपनाएँ।
कारण: फसल उत्पादन एक समग्र प्रक्रिया है। केवल अच्छे बीज (क) या केवल सिंचाई व उर्वरक (ख) से पूर्ण लाभ नहीं मिल सकता। अधिकतम उत्पादन के लिए आधुनिक कृषि के सभी घटकों—उन्नत बीज, समय पर सिंचाई, संतुलित पोषण (उर्वरक) और रोगों व कीटों से सुरक्षा—का एक साथ उपयोग आवश्यक है। यह संयुक्त दृष्टिकोण ही स्वस्थ फसल, उच्च उपज और अधिक लाभ सुनिश्चित करता है।
उत्तर 1:
निरोधक विधियाँ (जैसे स्वच्छ खेती, फसल चक्र) और जैव नियंत्रण (जैसे कीटभक्षी पक्षी/कीटों का उपयोग) फसल सुरक्षा के लिए अच्छे माने जाते हैं क्योंकि:
1. ये पर्यावरण के अनुकूल हैं और मृदा, जल व वायु प्रदूषण नहीं करते।
2. इनसे फसल में हानिकारक रसायनों के अवशेष नहीं रह जाते, जिससे उत्पादन मनुष्यों के लिए सुरक्षित रहता है।
3. ये विधियाँ लक्षित कीटों या रोगों के प्राकृतिक शत्रुओं को नष्ट नहीं करतीं, बल्कि उनका संरक्षण करती हैं।
4. कीटों में रासायनिक प्रतिरोधक क्षमता (Resistance) विकसित होने का खतरा नहीं रहता।
5. ये दीर्घकाल में टिकाऊ और किफायती होती हैं।
उत्तर 2:
भंडारण के दौरान अनाज की हानि के लिए मुख्य रूप से दो प्रकार के कारक उत्तरदायी होते हैं:
1. जैविक कारक: ये सजीव कारक हैं जो अनाज को खाकर, दूषित करके या सड़ाकर नुकसान पहुँचाते हैं। इनमें शामिल हैं: कीट (दीमक, भृंग), कृंतक (चूहे, गिलहरी), कवक (फफूंद), चिंचड़ी और जीवाणु आदि।
2. अजैविक कारक: ये भौतिक या पर्यावरणीय कारक हैं। इनमें भंडारण स्थान पर अनुचित नमी (आर्द्रता), अनुकूल तापमान (जो कीटों व कवक के विकास में सहायक हो), अशुद्धियाँ और अपर्याप्त वायु संचार शामिल हैं।
उत्तर 1:
पशुओं की नस्ल सुधार के लिए प्रायः संकरण (Hybridization) विधि का उपयोग किया जाता है।
कारण: इस विधि में दो अलग-अलग नस्लों के अच्छे गुणों को एक नई संतति (संकर नस्ल) में एकत्रित किया जाता है। उदाहरण के लिए, एक देशी नस्ल (जिसमें स्थानीय रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है) का संकरण एक विदेशी नस्ल (जो अधिक दूध उत्पादन करती है) के साथ कराया जाता है। इससे प्राप्त संकर नस्ल में दोनों के वांछनीय गुण—रोग प्रतिरोधक क्षमता और अधिक दूध उत्पादन—आ जाते हैं, जिससे पशुपालन अधिक लाभदायक बन जाता है।
उत्तर 1:
इस कथन का आशय है कि मुर्गी पालन (कुक्कुट) एक बहुत ही कुशल खाद्य उत्पादन प्रणाली है।
• अल्प रेशे वाले खाद्य पदार्थ: ये ऐसे अनाज या चारे हैं जिनमें रुक्षांश (फाइबर) की मात्रा कम होती है, जैसे मक्का, ज्वार आदि। ये मनुष्यों के लिए संतुलित आहार नहीं हैं क्योंकि इनमें फाइबर के अलावा अन्य आवश्यक पोषक तत्व भी पर्याप्त मात्रा में नहीं होते।
• कुक्कुट की भूमिका: मुर्गियाँ (ब्रॉयलर और लेयर) इन्हीं साधारण, कम फाइबर वाले दानों को खाकर उन्हें उच्च गुणवत्ता वाले पशु प्रोटीन (अंडा और मांस) में बदल देती हैं। अंडे और मुर्गे के मांस में प्रोटीन, वसा, विटामिन और खनिज प्रचुर मात्रा में होते हैं, जो मानव पोषण के लिए उत्कृष्ट हैं। इस प्रकार, कुक्कुट पालन कम पोषक मूल्य वाले चारे को मानव उपभोग के लिए उच्च पोषक मूल्य वाले भोजन में परिवर्तित करने का एक सक्षम तरीका है।
उत्तर 1:
पशुपालन और कुक्कुट पालन की सफल प्रबंधन प्रणाली में निम्नलिखित मुख्य समानताएँ पाई जाती हैं:
1. उचित आवास: दोनों के लिए स्वच्छ, हवादार और उचित तापमान वाले आवास (शेड/शेड) की आवश्यकता होती है।
2. संतुलित आहार: दोनों को उनकी आयु और उत्पादन आवश्यकताओं के अनुसार पौष्टिक व संतुलित आहार देना आवश्यक है।
3. रोग नियंत्रण: दोनों ही मामलों में नियमित टीकाकरण और स्वच्छता बनाए रखकर रोगों से बचाव किया जाता है।
4. नस्ल सुधार: अधिक उत्पादन के लिए दोनों में ही उन्नत और बेहतर गुणों वाली नस्लों का चयन व विकास किया जाता है।
5. वैज्ञानिक प्रबंधन: दोनों में ही वैज्ञानिक तरीकों से देखभाल करना लाभ को बढ़ाता है।
उत्तर 2:
| विशेषता | ब्रॉयलर | लेयर (अंडे देने वाली मुर्गी) |
|---|---|---|
| उद्देश्य | मांस उत्पादन के लिए पाली जाती है। | अंडा उत्पादन के लिए पाली जाती है। |
| पोषण (आहार) | तेजी से वृद्धि और मांस बनाने के लिए आहार में प्रोटीन और वसा की मात्रा अधिक होती है। | अच्छी गुणवत्ता वाले अंडों के लिए आहार में प्रोटीन, कैल्शियम, विटामिन-A और विटामिन-K की मात्रा अधिक रखी जाती है। |
| वृद्धि दर | वृद्धि बहुत तेज गति से होती है; 6-8 सप्ताह में ही बाजार के लिए तैयार हो जाती है। | वृद्धि दर ब्रॉयलर की तुलना में धीमी होती है। |
| आवास प्रबंधन | इन्हें अधिक स्थान की आवश्यकता होती है ताकि वे स्वतंत्र रूप से घूम-फिर सकें और मांस बना सकें। | इनके लिए विशेष घोंसले वाली व्यवस्था की जाती है ताकि अंडे आसानी से एकत्र किए जा सकें। |
| रोग प्रतिरोधक क्षमता | तेज वृद्धि के कारण इनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता अपेक्षाकृत कम हो सकती है। | ये आमतौर पर ब्रॉयलर की तुलना में अधिक रोग-प्रतिरोधी होती हैं। |
उत्तर 1:
मछलियाँ प्राप्त करने की दो प्रमुख विधियाँ हैं:
1. प्रग्रहण मत्स्यन (Capture Fishing): इसमें मछलियों को प्राकृतिक जल स्रोतों जैसे नदियों, झीलों, समुद्रों और महासागरों से पकड़ा जाता है। यह एक पारंपरिक विधि है जहाँ मछली उत्पादन प्रकृति पर निर्भर करता है।
2. मत्स्य पालन (Culture Fishing): इसमें मछलियों को मानव निर्मित या नियंत्रित वातावरण में पाला जाता है, जिसे मत्स्य संवर्धन कहते हैं। यह दो प्रकार का होता है:
(क) मरीकल्चर: समुद्री जल में मछली, झींगा, सीप आदि का पालन।
(ख) जल संवर्धन (एक्वाकल्चर): मीठे पानी (तालाब, टैंक) में मछलियों का पालन।
उत्तर 2:
मिश्रित मछली संवर्धन में एक ही तालाब में भोजन की आदतों में भिन्नता रखने वाली मछलियों की पाँच-छह प्रजातियों को एक साथ पाला जाता है। इसके प्रमुख लाभ हैं:
1. संसाधनों का पूर्ण उपयोग: चूंकि सभी मछलियाँ अलग-अलग स्तरों (तल, मध्य, ऊपरी सतह) पर और अलग-अलग प्रकार का भोजन (शैवाल, कीड़े, केंचुए आदि) खाती हैं, इसलिए तालाब के हर हिस्से और उपलब्ध प्राकृतिक भोजन का अधिकतम उपयोग हो जाता है।
2. उत्पादन में वृद्धि: विभिन्न प्रजातियों के एक साथ पालने से प्रति इकाई क्षेत्र में मछली उत्पादन काफी बढ़ जाता है।
3.
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