UP Board class 9 Science 7. जीवों में विविधता is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. class 9 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
उत्तर: हम जीवधारियों का वर्गीकरण निम्नलिखित कारणों से करते हैं:
उत्तर: हमारे चारों ओर फैले जीव रूपों की विभिन्नता के तीन उदाहरण हैं:
उत्तर: जीवों के वर्गीकरण के लिए सर्वाधिक मूलभूत लक्षण (ख) उनकी कोशिका संरचना हो सकता है। कोशिका संरचना (जैसे प्रोकेरियोटिक या यूकैरियोटिक) जीवों में एक आधारभूत और स्थायी अंतर दर्शाती है, जबकि निवास स्थान परिस्थितियों के अनुसार बदल सकता है और एक ही आवास में बिल्कुल भिन्न प्रकार के जीव रह सकते हैं।
उत्तर: जीवों के प्रारंभिक विभाजन के लिए सबसे मूल लक्षण कोशिका की आंतरिक संरचना को आधार बनाया गया। इसके आधार पर सभी जीवों को दो बड़े समूहों में बाँटा गया:
उत्तर: जंतुओं और वनस्पतियों (पादपों) को निम्नलिखित मुख्य आधारों पर भिन्न वर्ग में रखा जाता है:
| आधार | पादप (वनस्पति) | जंतु |
|---|---|---|
| पोषण की विधि | ये प्रकाश-संश्लेषण द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं (स्वपोषी)। | ये भोजन के लिए दूसरे जीवों पर निर्भर रहते हैं (परपोषी)। |
| गमन | अधिकांश पौधे एक ही स्थान पर स्थिर रहते हैं। | जंतु भोजन, आश्रय आदि के लिए स्थान परिवर्तन कर सकते हैं। |
| कोशिका भित्ति | इनकी कोशिकाओं में सेल्यूलोज की बनी कठोर कोशिका भित्ति होती है। | जंतु कोशिकाओं में कोशिका भित्ति नहीं होती, केवल कोशिका झिल्ली होती है। |
| संचित भोजन | भोजन मुख्य रूप से स्टार्च के रूप में संचित रहता है। | भोजन ग्लाइकोजन के रूप में संचित रहता है। |
उत्तर: वे जीव जिनकी शारीरिक संरचना में प्राचीन काल से लेकर आज तक कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ है, आदिम जीव कहलाते हैं। इन्हें 'निम्न जीव' भी कहा जा सकता है।
आदिम जीव और उन्नत जीव में अंतर:
| आदिम जीव | उन्नत जीव |
|---|---|
| इनकी शारीरिक संरचना सरल होती है और समय के साथ लगभग अपरिवर्तित रही है। | इनकी शारीरिक संरचना जटिल होती है और समय के साथ इसमें पर्याप्त परिवर्तन हुए हैं। |
| उदाहरण: जीवाणु, नील-हरित शैवाल, स्पंज। | उदाहरण: आवृतबीजी पौधे, स्तनधारी जंतु, पक्षी। |
| ये प्रायः एककोशिकीय या सरल बहुकोशिकीय होते हैं। | ये जटिल बहुकोशिकीय जीव होते हैं, जिनमें ऊतकों और अंगों का स्पष्ट विभेदन होता है। |
उत्तर: हाँ, सामान्यतः उन्नत जीव और जटिल जीव एक ही अर्थ में प्रयोग किए जाते हैं। विकास की प्रक्रिया में, जिन जीवों की शारीरिक संरचना में अधिक परिवर्तन हुए हैं, वे अधिक जटिल बन गए हैं। इसलिए उन्नत जीवों में जटिलता अधिक पाई जाती है। उदाहरण के लिए, एक जीवाणु (आदिम) की तुलना में एक फूलदार पौधा या मनुष्य (उन्नत) की शारीरिक संरचना अत्यधिक जटिल है।
उत्तर: मोनेरा और प्रोटिस्टा जगत के जीवों के वर्गीकरण के मुख्य मापदंड निम्नलिखित हैं:
उत्तर: प्रकाश-संश्लेषण करने वाले एककोशिकीय यूकैरियोटिक जीव को प्रोटिस्टा जगत में रखा जाएगा। प्रोटिस्टा जगत में वे सभी यूकैरियोटिक जीव आते हैं जो न तो पौधे, न जंतु और न ही कवक की श्रेणी में आते हैं। उदाहरण: यूग्लीना जो एककोशिकीय है, क्लोरोफिल होने के कारण प्रकाश-संश्लेषण करती है और यूकैरियोटिक कोशिका रखती है।
उत्तर: वर्गीकरण के पदानुक्रम (जगत → संघ/विभाग → वर्ग → गण → कुल → वंश → जाति) में:
उत्तर: सरलतम पौधों को थैलोफाइटा (Thallophyta) वर्ग में रखा गया है। इस वर्ग के पौधों का शरीर थैलस (थैलस) नामक सरल संरचना का बना होता है, जिसमें जड़, तना और पत्ती जैसा स्पष्ट विभेदन नहीं होता। इन्हें सामान्यतः शैवाल कहा जाता है और ये मुख्य रूप से जल में पाए जाते हैं। उदाहरण: स्पाइरोगाइरा, यूलोथ्रिक्स।
उत्तर: टेरिडोफाइटा और फैनेरोगैम (आवृतबीजी एवं अनावृतबीजी) में अंतर:
| टेरिडोफाइटा | फैनेरोगैम |
|---|---|
| ये बीजरहित पौधे हैं। इनमें बीज उत्पन्न करने की क्षमता नहीं होती। | ये बीज उत्पन्न करने वाले पौधे हैं। |
| इनमें जननांग अप्रत्यक्ष या छिपे होते हैं। | इनमें जनन ऊतक पूर्ण विकसित एवं विभेदित होते हैं (जैसे फूल)। |
| इनमें संवहन ऊतक (जाइलम, फ्लोएम) पाए जाते हैं। | इनमें अच्छी तरह विकसित संवहन ऊतक पाए जाते हैं। |
| ये क्रिप्टोगैम (गुप्तबीजी) पौधों के अंतर्गत आते हैं। | ये फैनेरोगैम (प्रकटबीजी) पौधों के अंतर्गत आते हैं। |
| उदाहरण: फर्न, हॉर्स टेल। | उदाहरण: आम का पेड़, गुलाब, पाइनस। |
उत्तर: जिम्नोस्पर्म (अनावृतबीजी) और एंजियोस्पर्म (आवृतबीजी) में अंतर:
| जिम्नोस्पर्म | एंजियोस्पर्म |
|---|---|
| इन पौधों के बीज फलों द्वारा ढके नहीं होते, अर्थात नग्न बीज होते हैं। | इन पौधों के बीज फल के अंदर सुरक्षित रहते हैं। |
| इनमें पुष्प नहीं लगते। | इनमें पुष्प लगते हैं, इसलिए इन्हें पुष्पी पादप भी कहते हैं। |
| ये प्रायः बहुवर्षीय, सदाबहार और काष्ठीय (लकड़ी वाले) पौधे होते हैं। | ये एकवर्षीय, द्विवर्षीय या बहुवर्षीय, काष्ठीय या शाकीय किसी भी प्रकार के हो सकते हैं। |
| संवहन ऊतक होते हैं, लेकिन वाहिकाओं का अभाव होता है। | संवहन ऊतक अच्छी तरह विकसित होते हैं, जिनमें वाहिकाएँ पाई जाती हैं। |
| उदाहरण: पाइन, साइकस, देवदार। | उदाहरण: आम, गेहूँ, गुलाब, मटर। |
उत्तर: पोरिफेरा (स्पंज) और सीलेंटरेटा (निडारिया) में अंतर:
| पोरिफेरा | सीलेंटरेटा |
|---|---|
| इनके शरीर में असंख्य छोटे-छोटे छिद्र (पोर) होते हैं। | इनके शरीर में छिद्र नहीं होते, बल्कि एक ही बड़ा मुख छिद्र होता है। |
| इनमें विशिष्ट ऊतक नहीं पाए जाते। | इनमें ऊतक स्तर की संगठन पाया जाता है। |
| ये प्रायः स्थिर (चलनहीन) होते हैं और चट्टानों आदि से चिपके रहते हैं। | ये प्रायः मुक्त रूप से तैर सकते हैं या चट्टानों से चिपके रह सकते हैं। |
| इनमें द्विस्तरीय शरीर भित्ति होती है, लेकिन विशेष कोशिका स्तर नहीं। | इनमें स्पष्ट द्विस्तरीय (एक्टोडर्म और एंडोडर्म) शरीर भित्ति होती है। |
| उदाहरण: स्पंज (साइकॉन, यूप्लेक्टेलिया)। | उदाहरण: हाइड्रा, जेलीफिश, कोरल। |
उत्तर: एनेलिडा और आर्थोपोडा संघ के जंतुओं में अंतर:
| एनेलिडा | आर्थोपोडा |
|---|---|
| इनका शरीर खंडित होता है और प्रत्येक खंड लगभग एक जैसा दिखता है। | इनका शरीर भी खंडित होता है, लेकिन सिर, वक्ष और उदर में विभाजित होता है। |
| इनमें जोड़दार पैर नहीं होते। इनमें सेटी (छोटे बाल) पाए जाते हैं जो गमन में सहायक होते हैं। | इनमें जोड़दार पैर पाए जाते हैं, जो गमन के मुख्य अंग हैं। |
| इनमें कठोर बाह्य कंकाल नहीं होता। | इनमें काइटिन का बना कठोर बाह्य कंकाल होता है। |
| रक्त संचार तंत्र बंद प्रकार का होता है। | रक्त संचार तंत्र खुला प्रकार का होता है। |
| उदाहरण: केंचुआ, जोंक। | उदाहरण: तितली, झींगा, मकड़ी, कॉकरोच। |
उत्तर: उभयचर (एम्फीबिया) और सरीसृप (रेप्टीलिया) में अंतर:
| उभयचर (जल-स्थलचर) | सरीसृप |
|---|---|
| ये जल और स्थल दोनों स्थानों पर रह सकते हैं। | ये मुख्य रूप से स्थल पर रहते हैं, कुछ जल में भी रह सकते हैं। |
| इनकी त्वचा नम, चिकनी और श्लेष्मयुक्त होती है। | इनकी त्वचा सूखी, कठोर और शल्कों (स्केल्स) से ढकी होती है। |
| श्वसन त्वचा, फेफड़े और क्लोम (लार्वा अवस्था में) द्वारा होता है। | श्वसन केवल फेफड़ों द्वारा होता है। |
| ये अंडे जल में देते हैं। | ये स्थल पर अंडे देते हैं, जिनकी कवच कठोर होती है। |
| शरीर का तापमान वातावरण के अनुसार बदलता रहता है (असमतापी)। | ये भी असमतापी होते हैं। |
| उदाहरण: मेंढक, सैलामेंडर, टोड। | उदाहरण: छिपकली, साँप, कछुआ, मगरमच्छ। |
उत्तर: पक्षी (एव्स) और स्तनधारी (मैमेलिया) वर्ग के जंतुओं में अंतर:
| पक्षी वर्ग | स्तनपायी वर्ग |
|---|---|
| शरीर पंखों से ढका रहता है। | शरीर बालों या फर से ढका रहता है। |
| अगले पैर पंखों में रूपांतरित हो जाते हैं। | अगले पैर हाथ/पंजे के रूप में होते हैं। |
| ये अंडे देते हैं (अंडज)। | अधिकांश सीधे बच्चे को जन्म देते हैं (विविपरस)। कुछ अपवाद (प्लैटिपस) हैं। |
| इनमें दुग्ध ग्रंथियाँ नहीं होतीं। | इनमें नवजात के पोषण के लिए दुग्ध ग्रंथियाँ पाई जाती हैं। |
| दाँत नहीं होते, चोंच होती है। | दाँत पाए जाते हैं। |
| श्वसन फेफड़ों द्वारा होता है, जो वायु थैलियों से जुड़े होते हैं। | श्वसन केवल फेफड़ों द्वारा होता है। |
| उदाहरण: कबूतर, मुर्गी, तोता, मोर। | उदाहरण: मनुष्य, गाय, बिल्ली, व्हेल, चमगादड़। |
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