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उत्तर:- कविता की पहली दो पंक्तियों को पढ़ते ही मन में एक दुखद तस्वीर स्पष्ट हो जाती है। सुबह-सुबह, जब स्कूल जाने की उम्र के छोटे-छोटे बच्चे, अपने नन्हे कंधों पर बड़ी-बड़ी जिम्मेदारियों का बोझ लादे, काम पर जाते हुए नज़र आते हैं। उनकी आँखों में सपनों की जगह थकान और चेहरे पर मासूमियत की जगह चिंता की रेखाएँ दिखाई देती हैं। यह चित्र समाज की एक कड़वी सच्चाई और बचपन के शोषण को दर्शाता है, जो हमें यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि हमारा समाज कब तक इस स्थिति को सामान्य मानता रहेगा।
उत्तर:- कवि के अनुसार, बच्चों के काम पर जाने की स्थिति को प्रश्न के रूप में पूछना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि एक प्रश्न हमारी सोच को सक्रिय करता है। जब हम किसी बात को केवल एक तथ्य या विवरण के रूप में पढ़ते हैं, तो अक्सर उसे स्वीकार करके आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन जब वही बात एक सीधा सवाल बनकर हमारे सामने आती है – "काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे?" – तो यह हमारे मन में जवाब तलाशने की उत्सुकता पैदा करता है। यह प्रश्न हमें इस सामाजिक बुराई के कारणों पर विचार करने, अपनी जिम्मेदारी समझने और इसके समाधान के बारे में सोचने के लिए प्रेरित करता है। प्रश्न एक चुनौती है जो हमारी नैतिकता और संवेदनशीलता को झकझोरती है।
उत्तर:- बच्चों का सुविधा और मनोरंजन के साधनों से वंचित रहने का मूल कारण गहरी आर्थिक विषमता और गरीबी है। जिन परिवारों को दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ता है, वहाँ बच्चों का स्कूल जाना या खिलौनों से खेलना एक विलासिता बन जाता है। ऐसे में बच्चों से घर की आय बढ़ाने या घरेलू कामों में हाथ बंटाने की उम्मीद की जाती है। उनका बचपन रोज़ी-रोटी कमाने की जद्दोजहद में खो जाता है, जिसके चलते पढ़ाई, खेल-कूद और मनोरंजन जैसे बुनियादी अधिकार भी उनकी पहुँच से दूर हो जाते हैं।
उत्तर:- समाज में इस उदासीनता के पीछे कई मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारण हैं:
1. आदत और सामान्यीकरण: बाल श्रम इतना आम हो चुका है कि लोग इसे एक 'सामान्य' घटना मानने लगे हैं। बार-बार देखने से इसके प्रति संवेदनशीलता खत्म हो गई है।
2. व्यक्तिवादी सोच: आज का मनुष्य अक्सर केवल अपनी समस्याओं और सुविधाओं में व्यस्त रहता है। दूसरों की पीड़ा उसे अपने सीधे तौर पर प्रभावित नहीं करती, इसलिए वह उस ओर ध्यान नहीं देता।
3. जिम्मेदारी से बचना: बहुत से लोग सोचते हैं कि यह सरकार या कानून का काम है, उनकी निजी जिम्मेदारी नहीं। वे हस्तक्षेप करने से बचते हैं।
4. स्वार्थ: समाज का एक वर्ग सस्ते श्रम के रूप में बच्चों के काम करने से लाभान्वित होता है। इसलिए वे इस स्थिति को बदलना नहीं चाहते।
उत्तर:- मैंने अपने आस-पास के शहरी परिवेश में बच्चों को अक्सर निम्नलिखित स्थानों पर काम करते देखा है:
उत्तर:- बच्चों का काम पर जाना इसलिए एक बड़े हादसे के समान है क्योंकि यह किसी समाज के भविष्य को नष्ट कर देता है। बच्चे किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी होते हैं। उन्हें शिक्षा और विकास के अवसरों से वंचित करके, हम न केवल उनके व्यक्तिगत सपनों को दफन कर देते हैं, बल्कि देश की प्रगति की संभावनाओं को भी कुंद कर देते हैं। यह एक ऐसी मानवीय त्रासदी है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी गरीबी और अज्ञानता का चक्र बनाए रखती है। इसलिए यह केवल एक सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि मानवता के लिए एक गंभीर आपदा है।
उत्तर:- यदि मैं स्वयं को एक बाल श्रमिक की स्थिति में रखकर देखूँ, तो मेरे मन में भावनाओं का एक तूफान उठ खड़ा होता है। मुझे अपने ऊपर गहरा दुख और क्रोध आएगा कि मैं अपनी उम्र के दूसरे बच्चों की तरह स्कूल क्यों नहीं जा पा रहा हूँ। उन्हें नई किताबें, साफ़ वर्दी और खिलौने मिलते देखकर मन में हीनभावना और जलन पैदा होगी। थकान और भूख से व्याकुल होकर भी काम करने की मजबूरी मुझे निराश कर देगी। मेरे भीतर का बच्चा रो-रोकर पूछेगा कि यह ज़िंदगी क्यों मिली? मेरा आत्मविश्वास टूट जाएगा और भविष्य के प्रति कोई उम्मीद नहीं रहेगी।
उत्तर:- मेरे विचार से बच्चों को काम पर बिल्कुल नहीं भेजा जाना चाहिए, क्योंकि बचपन विकास, सीखने और स्वतंत्र रूप से सपने देखने का समय होता है। इस नाजुक उम्र में शारीरिक श्रम और मानसिक तनाव उनके शारीरिक और मानसिक विकास को बाधित करते हैं।
बच्चों को निम्नलिखित अवसर अवश्य मिलने चाहिए:
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