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गणेशशंकर विद्यार्थी - धर्म की आड़
उत्तर:- आज धर्म के नाम पर समाज में विभाजन पैदा किया जा रहा है। सांप्रदायिक दंगे करवाए जा रहे हैं, लोगों को एक-दूसरे के प्रति घृणा फैलाने के लिए उकसाया जा रहा है और धर्म के नाम पर भोले-भाले लोगों का शोषण किया जा रहा है।
उत्तर:- धर्म के नाम पर चल रहे इस व्यापार को रोकने के लिए हमें सामूहिक रूप से साहस दिखाना होगा। ऐसे स्वार्थी लोगों का पर्दाफाश करना होगा और आम जनता को जागरूक बनाना होगा ताकि वे इनकी चालाकियों को समझ सकें।
उत्तर:- लेखक के अनुसार स्वाधीनता आंदोलन का वह दिन सबसे बुरा था जब आंदोलन में धर्म के ठेकेदारों, मुल्ला-मौलवियों और पंडितों को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया। इससे आंदोलन का मूल उद्देश्य कमजोर पड़ गया और देश को इसका दीर्घकालीन नुकसान उठाना पड़ा।
उत्तर:- साधारण आदमी के मन में यह बात गहराई से बैठ गई है कि धर्म और ईमान की रक्षा के लिए प्राण तक न्योछावर कर देना चाहिए। वह बिना सोचे-समझे, केवल धर्म के नाम पर ही उत्तेजित होकर कुछ भी करने को तैयार हो जाता है।
उत्तर:- धर्म के दो स्पष्ट और वास्तविक चिह्न हैं - शुद्ध आचरण और सदाचार। बाहरी दिखावे की रस्में धर्म नहीं, बल्कि व्यक्ति के नैतिक व्यवहार और चरित्र की पवित्रता ही सच्चे धर्म का प्रमाण है।
उत्तर:- चलते-पुरज़े यानी धूर्त लोग धर्म के नाम पर साधारण लोगों की भावनाओं से खेलते हैं। वे उनकी धार्मिक निष्ठा और अज्ञानता का फायदा उठाकर उन्हें मूर्ख बनाते हैं, आपस में लड़ाते हैं और इस अवसर का उपयोग अपना नेतृत्व कायम रखने तथा स्वार्थ सिद्ध करने के लिए करते हैं।
उत्तर:- चालाक लोग साधारण आदमी की दो कमजोरियों का लाभ उठाते हैं - पहली, धर्म के प्रति उसकी गहरी लेकिन अंधी श्रद्धा, और दूसरी, धर्म के सही स्वरूप को न समझ पाने की अज्ञानता। इसका फायदा उठाकर वे उसे अपने मनचाहे रास्ते पर चलाते हैं और उसकी शक्ति व उत्साह का दुरुपयोग करते हैं।
उत्तर:- आने वाला समय दिखावटी और ढोंग पर आधारित धर्म को नहीं टिकने देगा। केवल नमाज पढ़ना, शंख बजाना या पूजा के बाहरी कर्मकांड करना ही धर्म नहीं है। जो धर्म बेईमानी, स्वार्थ और दूसरों को दुःख देने की आजादी देता है, वह भविष्य में स्वीकार्य नहीं होगा।
उत्तर:- हमारे स्वाधीन देश में हर किसी को अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता है। लेकिन यदि कोई इस स्वतंत्रता का दुरुपयोग करते हुए धर्म की आड़ लेकर लोगों को भड़काता है, समाज में फूट डालता है या अपना स्वार्थ सिद्ध करता है, तो ऐसा कार्य देश की स्वाधीनता के विरुद्ध माना जाएगा।
उत्तर:- पाश्चात्य देशों में धनी और निर्धन के बीच एक गहरी खाई है। वहाँ धनी वर्ग गरीबों का शोषण करके ही आगे बढ़ा है। वे धन के बल पर गरीबों पर नियंत्रण रखते हैं और उनसे मनमाना काम लेते हैं, जबकि गरीब कठिन परिश्रम के बावजूद मूलभूत सुविधाओं से वंचित रहते हैं। यही असमानता साम्यवाद जैसे विचारों के उदय का कारण बनी।
उत्तर:- वे लोग जो स्वयं को धार्मिक कहलाने के बावजूद दूसरों के साथ बुरा व्यवहार करते हैं, उनसे वे लोग कहीं अधिक अच्छे हैं जो भले ही नास्तिक हों या धर्म को जटिल रूप में न मानते हों, लेकिन उनका आचरण शुद्ध हो, वे दूसरों की मदद करते हों और किसी को ठगकर स्वार्थ न सिद्ध करते हों।
उत्तर:- धर्म और ईमान के नाम पर चल रहे इस शोषण के व्यापार को रोकने के लिए दो मुख्य कदम उठाने होंगे। पहला, आम जनता को शिक्षित और जागरूक बनाना ताकि वे धर्म के सही अर्थ और सिद्धांतों को समझ सकें और ठगों की चालाकियों से बच सकें। दूसरा, ऐसे स्वार्थी तत्वों का साहसपूर्वक विरोध करना और समाज के सामने उनकी वास्तविक मंशा को उजागर करना।
उत्तर:- लेखक के अनुसार, 'बुद्धि पर मार' का अर्थ है लोगों की सोचने-समझने की शक्ति को भ्रमित करके नष्ट कर देना। उनका कहना है कि जहाँ पश्चिम में 'धन की मार' है, वहीं भारत में 'बुद्धि की मार' है। यहाँ कुछ लोग ईश्वर और आत्मा का स्थान स्वयं ले लेते हैं और फिर धर्म, ईमान जैसे पवित्र शब्दों के पीछे छिपकर साधारण लोगों को आपस में लड़ाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं।
उत्तर:- लेखक के विचार में धर्म की भावना उदार और आंतरिक होनी चाहिए। धर्म केवल बाहरी रीति-रिवाजों, जैसे शंख बजाना या नमाज पढ़ने तक सीमित नहीं है। असली धर्म का लक्षण व्यक्ति का शुद्ध आचरण और सदाचार है। एक स्वाधीन देश में हर किसी को अपने ढंग से धर्म मानने की आजादी है, लेकिन उसका आधार नैतिकता और मानवता होना चाहिए।
उत्तर:- महात्मा गाँधी के लिए धर्म जीवन का मूल आधार था। वे धर्म के बिना एक कदम भी चलने को तैयार नहीं थे। परंतु उनका धर्म संकीर्ण या कट्टर नहीं था। उनके लिए धर्म का अर्थ था ऊँचे और उदार नैतिक तत्वों का पालन। वे सत्य और अहिंसा को सर्वोच्च धर्म मानते थे। उनका मानना था कि हर व्यक्ति को धर्म के सही स्वरूप को समझकर उसके अनुसार जीवन जीना चाहिए।
उत्तर:- समाज के सर्वांगीण कल्याण के लिए प्रत्येक व्यक्ति का अपना आचरण सुधारना अत्यंत आवश्यक है। जब तक हम स्वयं अच्छे आचरण, ईमानदारी और दयालुता को नहीं अपनाएंगे, तब तक हम दूसरों से अच्छाई की अपेक्षा नहीं कर सकते। अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करके ही हम दूसरों को सही राह दिखा सकते हैं और एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकते हैं।
उत्तर:- इस कथन का आशय है कि साधारण व्यक्ति में धर्म के प्रति इतनी गहरी भावना होती है कि वह उसके नाम पर तुरंत उत्तेजित हो जाता है। उसकी मुख्य कमी यह है कि वह धर्म के सही अर्थ को गहराई से नहीं समझता। इस अज्ञानता और जोश का फायदा चालाक लोग उठाते हैं और उसे अपने स्वार्थ के अनुसार किसी भी दिशा में मोड़ देते हैं, जहाँ वह बिना सोचे-समझे जुट जाता है।
उत्तर:- इस वाक्य का अर्थ है कि भारत में कुछ धूर्त लोग पहले लोगों की बुद्धि को भ्रमित करके स्वयं को ईश्वर या आत्मा का प्रतिनिधि साबित करते हैं। एक बार जनता का विश्वास हासिल करने के बाद, वे धर्म, ईमान जैसे पवित्र शब्दों का इस्तेमाल करके लोगों को आपस में लड़ाते-भिड़ाते हैं और इस अव्यवस्था में अपना स्वार्थ सिद्ध कर लेते हैं।
उत्तर:- इस पंक्ति का भाव यह है कि भविष्य में केवल बाहरी पूजा-पाठ या धार्मिक रीति-रिवाजों को ही महत्व नहीं दिया जाएगा। असली कसौटी व्यक्ति का दैनिक जीवन में आचरण होगी। यदि कोई व्यक्ति पूजा करने के बाद भी बेईमानी या दूसरों को सताता है, तो उसे धार्मिक नहीं माना जाएगा। सच्ची भलमनसाहत उसके व्यवहार में झलकनी चाहिए।
उत्तर:- इस कथन के माध्यम से ईश्वर मनुष्य से कह रहा है कि केवल मुझे मान लेने भर से मेरा अस्तित्व सिद्ध नहीं होगा। यदि तुम सच में मुझे चाहते हो, तो पहले अपने अंदर के पशुत्व (क्रूरता, हिंसा, स्वार्थ) को छोड़कर मनुष्यत्व (दया, करुणा, नैतिकता) को अपनाओ। सभी मनुष्यों के साथ अच्छा व्यवहार करो, क्योंकि वे सभी मेरे ही रूप हैं। यही मेरी सच्ची भक्ति का मार्ग है।
1. सुगम - दुर्गम
2. धर्म - अधर्म
3. ईमान - बेईमानी
4. साधारण - विशेष/असाधारण
5. स्वार्थ - परमार्थ/निःस्वार्थ
6. दुरूपयोग - सदुपयोग
7. नियंत्रित - अनियंत्रित
8. स्वाधीनता - पराधीनता
ला - लापता, लापरवाह
बिला - बिलावजह, बिलाशक
बे - बेईमान, बेकार
बद - बदनाम, बदसूरत
ना - नालायक, नासमझ
खुश - खुशखबरी, खुशनसीब
हर - हररोज, हरजाई
गैर - गैरकानूनी, गैरहाजिर
उदाहरण : देव + त्व = देवत्व
1. मनुष्य + त्व = मनुष्यत्व
2. बंधु + त्व = बंधुत्व
3. गुरु + त्व = गुरुत्व
4. स्त्री + त्व = स्त्रीत्व
5. महत् + त्व = महत्त्व
उदाहरण - चलते-पुरज़े
पाठ में आए संयुक्त शब्द:
लड़ाना-भिड़ाना, सुख-दुःख, पूजा-पाठ, भली-भाँति, देश-भर, मन-माना, नित्य-प्रति, स्वार्थ-सिद्धि
1. राम ने पुस्तक पढ़ी और उसका सार भी लिख लिया।
2. वह कक्षा में प्रथम आया, उसने पुरस्कार भी जीता।
3. मुझे बाजार जाना है और बैंक का काम भी निपटाना है।
4. उसने मेरी सहायता की और समय पर काम भी पूरा करवाया।
5. यह कार्य कठिन है, परंतु असंभव भी नहीं है।
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