UP Board class 9 Hindi 2. राहुल संकृत्यायन - ल्हासा की ओर is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. class 9 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
उत्तर:- लेखक के अनुसार, आधुनिक समय में 'सुख' की परिभाषा बदल गई है। पहले सुख का मतलब मन की शांति और संतोष से था, लेकिन आजकल लोग भौतिक सुख-सुविधाओं और विलासिता की वस्तुओं को ही असली सुख मानने लगे हैं। आरामदायक जीवन, नई-नई चीजें खरीदना और उनका उपभोग करना ही लोगों के लिए सुख का पर्याय बन गया है। इस प्रकार, वर्तमान समाज में सुख का अर्थ केवल उपभोग और भोग से जुड़ गया है।
उत्तर:- आज की उपभोक्तावादी संस्कृति हमारे दैनिक जीवन के हर पहलू को गहराई से प्रभावित कर रही है। इसके कारण:
1. सांस्कृतिक पहचान का क्षरण: हम अपनी परंपराओं और मूल्यों को भूलकर पश्चिमी ढंग का जीवन जीने लगे हैं।
2. सामाजिक संबंधों में कमी: लोग भौतिक चीजों में इतने व्यस्त हो गए हैं कि परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताना कम हो गया है।
3. विज्ञापनों का प्रभाव: हम वही खाना, पहनना और इस्तेमाल करना चाहते हैं जो टीवी और इंटरनेट के विज्ञापन हमें दिखाते हैं।
4. नैतिक मूल्यों में गिरावट: लालच, स्वार्थ और प्रतिस्पर्धा बढ़ने से ईमानदारी और सहयोग की भावना कमजोर हुई है।
5. मानसिक अशांति: लगातार नई चीजें पाने की दौड़ में तनाव और असंतोष बढ़ रहा है।
इस प्रकार, उपभोक्तावाद हमें भौतिक वस्तुओं का गुलाम बना रहा है और हमारे सामाजिक व नैतिक जीवन को नुकसान पहुँचा रहा है।
उत्तर:- महात्मा गाँधी ने उपभोक्तावादी संस्कृति को समाज के लिए एक बड़ी चुनौती इसलिए बताया है क्योंकि यह संस्कृति उनके आदर्शों के बिल्कुल विपरीत है। गाँधी जी सादगी, संयम, आत्मनिर्भरता और सामाजिक एकता में विश्वास रखते थे। उपभोक्तावाद इन सभी मूल्यों को नष्ट कर देता है। यह संस्कृति लोगों में अधिक से अधिक खरीदारी और दिखावे की प्रवृत्ति पैदा करती है, जिससे समाज में असमानता, स्वार्थ और भौतिकतावाद बढ़ता है। गाँधी जी का मानना था कि यह रास्ता समाज को टुकड़ों में बाँट देगा और लोगों को आपसी प्रेम व सहयोग से दूर कर देगा, इसलिए उन्होंने इसे एक गंभीर चुनौती के रूप में देखा।
उत्तर:- इस कथन का आशय यह है कि उपभोक्तावादी संस्कृति का प्रभाव इतना सूक्ष्म और गहरा है कि हमें पता भी नहीं चलता और हमारे विचार व व्यवहार बदलने लगते हैं। हम धीरे-धीरे उन चीजों को जरूरी मानने लगते हैं जो वास्तव में नहीं हैं। हमारी पहचान अब हमारे गुणों से नहीं, बल्कि हमारे पास मौजूद ब्रांडेड कपड़ों, गैजेट्स और कार से होने लगी है। इस तरह, हम अनजाने में ही भौतिक वस्तुओं के प्रति समर्पित होकर रह जाते हैं और अपनी असली इच्छाओं व जरूरतों को भूल जाते हैं।
उत्तर:- इस वाक्य का अर्थ है कि समाज में प्रतिष्ठा दिखाने के तरीके बहुत विचित्र और कई बार मूर्खतापूर्ण भी हो सकते हैं। लोग दूसरों पर रौब जमाने या अपनी शान दिखाने के लिए ऐसे-ऐसे काम करते हैं जो सुनने या देखने में हँसी के पात्र लगते हैं। जैसे, पाठ में अमेरिका के उदाहरण में बताया गया है कि लोग अपनी कब्र को भी शानदार बनवाने के लिए जीते-जी पैसे जमा करते हैं। यह दिखाता है कि कैसे प्रतिष्ठा की अंधी दौड़ में लोग तर्कहीन और हास्यास्पद कदम भी उठा लेते हैं।
उत्तर:- विज्ञापन बनाने वाले मनोविज्ञान का गहरा ज्ञान रखते हैं और हमारी कमजोरियों को भाँपकर आकर्षक संदेश बनाते हैं। वे प्रसिद्ध अभिनेताओं या खिलाड़ियों को लगाकर हम पर भरोसा पैदा करते हैं। आकर्षक दृश्य, संगीत और नारों के जरिए वे यह भ्रम पैदा करते हैं कि उस वस्तु को खरीदने से हमारा जीवन बेहतर, सुंदर और सफल हो जाएगा। वे हमारे अंदर 'छूट जाएगा' या 'दूसरों के पास है' जैसा डर या लालच पैदा करते हैं। इसीलिए, चाहे वस्तु की हमें जरूरत न भी हो, विज्ञापन का जादू हमें उसे खरीदने के लिए मजबूर कर देता है।
उत्तर:- निश्चित रूप से वस्तु खरीदने का आधार उसकी गुणवत्ता होनी चाहिए, विज्ञापन नहीं। इसके पीछे निम्नलिखित तर्क हैं:
1. विज्ञापन भ्रम पैदा करता है: विज्ञापन का उद्देश्य बेचना है, सच बताना नहीं। वह चमक-दमक दिखाकर घटिया गुणवत्ता की वस्तु भी बेच सकता है।
2. गुणवत्ता टिकाऊपन लाती है: अच्छी गुणवत्ता की चीज लंबे समय तक चलती है और पैसे की बचत कराती है, जबकि सिर्फ विज्ञापन देखकर खरीदी गई वस्तु जल्दी खराब हो सकती है।
3. वास्तविक जरूरत की पूर्ति: गुणवत्ता के आधार पर खरीदारी करने से हमें वही चीज मिलती है जिसकी हमें वास्तव में आवश्यकता है। विज्ञापन से प्रभावित होकर हम अनावश्यक चीजें खरीद लेते हैं।
4. विवेकशील उपभोक्ता बनना: गुणवत्ता को प्राथमिकता देना एक समझदार और विवेकशील उपभोक्ता होने की निशानी है, जो देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी अच्छा है।
उत्तर:- आज का युग दिखावे की संस्कृति का युग बन गया है। लोग अब 'होना' नहीं, 'दिखना' चाहते हैं। इसका प्रभाव हर जगह दिखाई देता है:
• सामाजिक जीवन: शादी-ब्याह, पार्टियाँ अब अपनों से मिलने का समय नहीं, बल्कि महँगे कपड़े, जेवर और खाने का प्रदर्शन करने का मौका बन गए हैं।
• व्यक्तिगत जीवन: लोग नवीनतम मोबाइल फोन, कार या घड़ी इसलिए खरीदते हैं ताकि दूसरे उन्हें अमीर और आधुनिक समझें, न कि उसकी उपयोगिता के कारण।
• त्योहारों का स्वरूप: दीवाली पर घर सजाने की होड़, रक्षाबंधन पर महँगे उपहारों का आदान-प्रदान इसी दिखावे का हिस्सा है।
इस संस्कृति के दुष्परिणाम गंभीर हैं। इससे लोगों में ईर्ष्या, तनाव और आर्थिक कर्ज बढ़ रहा है। असली रिश्ते और खुशी गौण हो गई है। समाज का ध्यान भौतिक चमक-दमक से हटाकर मानवीय मूल्यों की ओर लौटाना आज की सबसे बड़ी जरूरत है।
उत्तर:- आज की उपभोक्तावादी संस्कृति ने हमारे रीति-रिवाजों और त्योहारों का मूल स्वरूप ही बदल दिया है। त्योहार अब आपसी प्रेम और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक न रहकर, खरीदारी और दिखावे के अवसर बन गए हैं। दीवाली पर घर में दीये जलाने और पूजा करने से ज्यादा जोर नए कपड़े, महँगे उपहार और पटाखों पर होता है। रक्षाबंधन पर बहनें अब साधारण राखी नहीं, बल्कि महँगी और ब्रांडेड राखी खरीदती हैं। कंपनियाँ हर त्योहार से पहले विज्ञापनों के जरिए हमें और अधिक खर्च करने के लिए उकसाती हैं। पहले होली के गुजिए या दशहरे के पकवान घर में बनते थे, आज सब बाजार से पैकेटबंद खरीदे जाते हैं। इस प्रकार, उपभोक्तावाद ने त्योहारों की आत्मा को व्यावसायिक बना दिया है।
इस वाक्य में 'बदल रहा है' क्रिया है। यह क्रिया कैसे हो रही है - 'धीरे-धीरे'। अतः यहाँ 'धीरे-धीरे' क्रिया-विशेषण है। जो शब्द क्रिया की विशेषता बताते हैं, क्रिया-विशेषण कहलाते हैं। जहाँ वाक्य में हमें पता चलता है क्रिया कैसे, कब, कितनी और कहाँ हो रही है, वहाँ वह शब्द क्रिया-विशेषण कहलाता है।
ऊपर दिए गए उदाहरण को ध्यान में रखते हुए क्रिया-विशेषण से युक्त पाँच वाक्य पाठ में से छाँटकर लिखिए ।
उत्तर:- पाठ से क्रिया-विशेषण युक्त वाक्य:
1. धीरे-धीरे सब कुछ बदल रहा है। (धीरे-धीरे - रीतिवाचक क्रिया-विशेषण)
2. आपको लुभाने की जी-तोड़ कोशिश में निरंतर लगी रहती है। (निरंतर - रीतिवाचक क्रिया-विशेषण)
3. सामंती संस्कृति के तत्व भारत में पहले भी रहे हैं। (पहले - कालवाचक क्रिया-विशेषण)
4. अमेरिका में आज जो हो रहा है, कल वह भारत में भी आ सकता है। (आज, कल - कालवाचक क्रिया-विशेषण)
5. हमारे सामाजिक सरोकारों में कमी आ रही है। (कमी - परिमाणवाचक क्रिया-विशेषण)
उत्तर:-
धीरे-धीरे: सूरज धीरे-धीरे अस्त हो गया।
जोर से: बच्चा जोर से रोने लगा।
लगातार: वह लगातार तीन घंटे से पढ़ रहा है।
हमेशा: सच्चे मित्र हमेशा साथ देते हैं।
आजकल: आजकल मौसम बहुत सुहावना है।
कम: बारिश कम होने से फसल प्रभावित हुई।
ज्यादा: उसने परीक्षा में मेहनत ज्यादा की थी।
यहाँ: कृपया यहाँ बैठ जाइए।
उधर: तुम उधर देखो, एक तितली उड़ रही है।
बाहर: बच्चे खेलने के लिए बाहर गए हैं।
उत्तर:-
क्रिया-विशेषण: निरंतर (रीतिवाचक), कल रात (कालवाचक)
विशेषण: कोई विशेषण इस वाक्य में नहीं है।
उत्तर:-
क्रिया-विशेषण: मुँह में (स्थानवाचक)
विशेषण: पके
उत्तर:-
क्रिया-विशेषण: ज़ोरों की (रीतिवाचक)
विशेषण: हलकी
उत्तर:-
क्रिया-विशेषण: उतना, जितनी (परिमाणवाचक)
विशेषण: कोई विशेषण नहीं है।
उत्तर:-
क्रिया-विशेषण: आजकल (कालवाचक), बाज़ार (स्थानवाचक)
विशेषण: विलासिता की
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