UP Board class 9 Hindi 3. श्यामाचरण दुबे - उपभोक्तावाद की संस्कृति is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. class 9 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
लेखक के विचार में आज 'सुख' की परिभाषा बदल गई है। पहले सुख का मतलब मन की शांति और संतोष से था, लेकिन आजकल लोग भौतिक साधनों और भोग-विलास की चीजों को ही सुख मानने लगे हैं। मानसिक व शारीरिक आराम देने वाले उपकरण, जैसे- एयर कंडीशनर, आरामदायक गाड़ियाँ, महंगे फोन आदि को 'सुख' का पर्याय समझा जाता है। इस तरह, वर्तमान समय में लोग केवल उपभोग करने के आनंद को ही असली सुख मान बैठे हैं।
आज की उपभोक्तावादी संस्कृति हमारे रोजमर्रा के जीवन पर गहरा असर डाल रही है। इसके कारण:
इस प्रकार, हम उपभोक्तावाद के गुलाम बनते जा रहे हैं और सही विकास के लक्ष्य से भटक रहे हैं।
महात्मा गाँधी सादगी, संयम और उच्च नैतिक मूल्यों में विश्वास रखते थे। वे चाहते थे कि समाज में प्रेम, भाईचारा और सामूहिक हित की भावना बढ़े। लेकिन उपभोक्तावादी संस्कृति इन सबके उलट है। यह भोग-विलास, प्रतिस्पर्धा और स्वार्थ को बढ़ावा देती है। गाँधी जी को डर था कि इस संस्कृति के चलते लोग अपनी मौलिक पहचान, सभ्यता और सांस्कृतिक मूल्यों को भूल जाएंगे। व्यक्ति के स्वार्थी होने से सामाजिक एकता टूटेगी, जो देश के लिए एक बड़ी चुनौती है और समाज के पतन का कारण बन सकती है।
इस कथन का आशय है कि उपभोक्तावाद का प्रभाव इतना सूक्ष्म और शक्तिशाली है कि हमें पता भी नहीं चलता और यह धीरे-धीरे हमारे स्वभाव और चरित्र को बदल देता है। हम नए-नए उत्पाद खरीदने और उनका उपयोग करने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि उन्हीं को पाना हमारा लक्ष्य बन जाता है। हम भौतिक वस्तुओं के प्रति इतने आसक्त हो जाते हैं कि मानो हमारा जीवन उन्हीं को समर्पित हो गया है और हम उनके गुलाम बनते जा रहे हैं।
इस पंक्ति का मतलब है कि समाज में प्रतिष्ठा दिखाने के तरीके बहुत अजीबोगरीब भी हो सकते हैं, जिन पर हंसी आती है। लोग दूसरों से आगे निकलने और अपनी शान दिखाने के लिए ऐसे-ऐसे काम करते हैं जो बिल्कुल बेमतलब होते हैं। लेखक ने उदाहरण दिया है कि अमेरिका में कुछ लोग जीते-जी अपनी कब्र को शानदार बनवाने के लिए पैसा खर्च करते हैं, ताकि मरने के बाद भी उनकी 'प्रतिष्ठा' बनी रहे। यह एक हास्यास्पद और झूठी प्रतिष्ठा का उदाहरण है।
टीवी पर दिखाए जाने वाले विज्ञापन बहुत ही आकर्षक और प्रभावशाली तरीके से बनाए जाते हैं, जिसके कारण हम अनुपयोगी वस्तु खरीदने के लिए भी लालायित हो उठते हैं। इसके पीछे कई कारण हैं:
इन सभी तरीकों से विज्ञापन हमारी सोच पर कब्जा कर लेते हैं और हम अनावश्यक चीजें खरीद बैठते हैं।
वस्तुओं को खरीदने का एकमात्र आधार उसकी गुणवत्ता होनी चाहिए, विज्ञापन नहीं। इसके पीछे निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं:
आज के उपभोक्तावादी युग में 'दिखावे की संस्कृति' बहुत तेजी से फैल रही है। लोग अब वस्तुएं अपनी जरूरत के लिए नहीं, बल्कि दूसरों को दिखाने और प्रभावित करने के लिए खरीदते हैं। एक महंगा फोन, गाड़ी या कपड़ा व्यक्ति की सामाजिक हैसियत का प्रतीक बन गया है। यहाँ तक कि शादी-ब्याह और त्योहारों पर भी लोग इस बात की होड़ लगाते हैं कि किसने ज्यादा खर्च किया और ज्यादा शानदार आयोजन किया।
इस दिखावे की संस्कृति के बहुत बुरे परिणाम सामने आ रहे हैं:
आज की उपभोक्ता संस्कृति ने हमारे रीति-रिवाजों और त्योहारों का स्वरूप ही बदल दिया है। त्योहार अब आपसी मेल-जोल और खुशियाँ बाँटने के बजाय, भौतिक चीजों की होड़ और दिखावे का माध्यम बन गए हैं। दिवाली पर असली खुशी दीये जलाने और पूजा में नहीं, बल्कि नए-नए कपड़े, महंगे उपहार और तरह-तरह के पटाखे जलाने में मानी जाने लगी है। रक्षाबंधन पर बाजार में सैकड़ों तरह की महंगी राखियाँ आती हैं, और भाई-बहन के पवित्र रिश्ते में भी 'कौन ज्यादा महंगी राखी या उपहार देता है' की प्रतिस्पर्धा आ गई है। शादियाँ तो अब सादगी के समारोह न रहकर, भव्य दिखावे के आयोजन बन चुके हैं, जहाँ खर्च का आंकड़ा ही प्रतिष्ठा का पैमाना है। इस तरह, उपभोक्तावाद ने हमारे पवित्र पर्वों और संस्कारों की मूल भावना को कमजोर कर दिया है।
उत्तर:-
1. धीरे-धीरे सब कुछ बदल रहा है। ('धीरे-धीरे' - रीतिवाचक क्रिया-विशेषण)
2. आपको लुभाने की जी-तोड़ कोशिश में निरंतर लगी रहती है। ('निरंतर' - रीतिवाचक क्रिया-विशेषण)
3. सामंती संस्कृति के तत्व भारत में पहले भी रहे हैं। ('पहले' - कालवाचक क्रिया-विशेषण)
4. अमेरिका में आज जो हो रहा है, कल वह भारत में भी आ सकता है। ('आज', 'कल' - कालवाचक क्रिया-विशेषण)
5. हमारे सामाजिक सरोकारों में कमी आ रही है। ('कमी' - परिमाणवाचक क्रिया-विशेषण)
| क्रिया-विशेषण | वाक्य |
|---|---|
| धीरे-धीरे | सूरज धीरे-धीरे अस्त हो गया। |
| जोर से | वह दरवाजा जोर से बंद करके चला गया। |
| लगातार | लगातार तीन दिनों से बारिश हो रही है। |
| हमेशा | सच्चे मित्र हमेशा काम आते हैं। |
| आजकल | आजकल मौसम बहुत सुहावना है। |
| कम | इस बार फसल कम हुई है। |
| ज्यादा | आज मैंने ज्यादा चाय पी ली है। |
| यहाँ | तुम यहाँ बैठकर प्रतीक्षा करो। |
| उधर | तुम उधर मत देखो, यहाँ देखो। |
| बाहर | बच्चे खेलने के लिए बाहर गए हैं। |
क्रिया-विशेषण: निरंतर (रीतिवाचक), कल रात (कालवाचक)
विशेषण: इस वाक्य में कोई विशेषण शब्द नहीं है।
क्रिया-विशेषण: मुँह में (स्थानवाचक)
विशेषण: पके
क्रिया-विशेषण: ज़ोरों की (रीतिवाचक)
विशेषण: हलकी
क्रिया-विशेषण: उतना, जितनी (परिमाणवाचक)
विशेषण: इस वाक्य में कोई विशेषण शब्द नहीं है।
क्रिया-विशेषण: आजकल (कालवाचक)
विशेषण: विलासिता की (यहाँ 'विलासिता' संज्ञा है और 'की' विशेषण बना रही है)
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