UP Board class 9 Hindi 9. रैदास (कविता) is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. class 9 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
उत्तर:- इस पद में कवि रैदास ने भगवान और भक्त के अटूट संबंध को दर्शाने के लिए कई सुंदर उदाहरण दिए हैं। भगवान और भक्त की तुलना निम्नलिखित चीजों से की गई है:
उत्तर:- पहले पद में प्रयुक्त तुकांत शब्दों के जोड़े इस प्रकार हैं:
उत्तर:- पहले पद में अर्थ की दृष्टि से आपस में जुड़े हुए शब्द-युग्म निम्नलिखित हैं:
उत्तर:- दूसरे पद में कवि रैदास ने 'गरीब निवाजु' ईश्वर अर्थात भगवान को कहा है। 'गरीब निवाजु' का अर्थ है - गरीबों पर दया करने वाला, उनका पालन-पोषण करने वाला।
रैदास कहते हैं कि ईश्वर किसी भी प्रकार के भेदभाव से परे हैं। वे समाज में उपेक्षित, गरीब और दीन-दुखियों पर विशेष कृपा बरसाते हैं। रैदास स्वयं एक ऐसे समाज से आते थे जिन्हें 'अछूत' माना जाता था, लेकिन ईश्वर की कृपा से ही वे एक महान संत बने और सभी के द्वारा पूज्यनीय हुए। इसलिए वे ईश्वर को 'गरीब निवाजु' कहकर उनकी दयालुता और न्यायप्रियता का वर्णन करते हैं।
उत्तर:- इस पंक्ति का आशय बहुत गहरा और सामाजिक संदेश से भरा हुआ है।
'जाकी छोति जगत कउ लागै' का अर्थ है - जिसके छूने मात्र से संसार (समाज) अपवित्र हो जाता है या दूर भागता है। यहाँ 'छोति' यानी 'छूत' की ओर संकेत है, जो उस समय की जाति व्यवस्था में निम्न जाति के लोगों के साथ होता था।
'ता पर तुहीं ढरै' का अर्थ है - उस (उपेक्षित व्यक्ति) पर केवल तू ही (हे प्रभु) दया करता है।
अर्थात, रैदास कहते हैं कि इस संसार में जिन गरीब, दलित और उपेक्षित लोगों को छूने से भी लोग डरते हैं, जिनसे समाज दूरी बनाकर रखता है, उन पर सिर्फ और सिर्फ तू ही, हे प्रभु! दया की बरसात करता है, उनकी सहायता करता है और उनकी पीड़ा हरता है। ईश्वर के लिए कोई भेदभाव नहीं है, वह सभी पर समान रूप से कृपालु है।
उत्तर:- संत रैदास ने अपने प्रभु के प्रति अनन्य प्रेम और भक्ति व्यक्त करते हुए उन्हें विभिन्न मधुर नामों से पुकारा है। इन नामों में से कुछ प्रमुख हैं:
उत्तर:- दिए गए शब्दों के प्रचलित (आधुनिक) रूप इस प्रकार हैं:
| पद में प्रयुक्त शब्द | प्रचलित रूप |
|---|---|
| मोरा | मोर |
| चंद | चाँद |
| बाती | बत्ती |
| जोति | ज्योति |
| जले | जलती है |
| राती | रात |
| छत्रु | शत्रु |
| धरे | धारण करता है |
| छोति | छूत |
| गेल | गईल, चला गया |
| तुहीं | तू ही |
| गुसइआ | गोसाईं (स्वामी) |
1. जाकी अँग-अँग बास समानी
भाव:- इस पंक्ति का भाव यह है कि जिस प्रकार चंदन के टुकड़े को पानी में घिसने या उसके संपर्क में रखने से पूरा पानी सुगंधित हो जाता है, उसी प्रकार सच्चे भक्त का हर अंग-अंग (शरीर का हर हिस्सा और मन) ईश्वर की भक्ति और प्रेम की सुगंध से भर जाता है। भक्त और ईश्वर का संबंध इतना गहरा हो जाता है कि भक्त के व्यक्तित्व से ही ईश्वरीय प्रेम की महक फैलने लगती है।
2. जैसे चितवत चंद चकोरा
भाव:- इस पंक्ति का भाव यह है कि जिस प्रकार चकोर पक्षी रातभर चंद्रमा की ओर एकटक देखता रहता है और उसकी चाँदनी पीने की चाह रखता है, ठीक उसी प्रकार मैं (भक्त रैदास) भी सदैव हे प्रभु! तुम्हारी ओर ही देखता रहता हूँ और तुम्हारे दिव्य प्रेम रूपी अमृत को पाने के लिए तरसता रहता हूँ। यहाँ भक्त की ईश्वर के प्रति एकनिष्ठ आकर्षण और लगाव को दर्शाया गया है।
3. जाकी जोति बरै दिन राती
भाव:- इस पंक्ति का भाव यह है कि कवि स्वयं को बत्ती (बाती) और ईश्वर को दीपक मानते हैं। वह ऐसा दीपक है जिसकी ज्योति (रोशनी) दिन-रात, अर्थात निरंतर और सदैव जलती रहती है, कभी बुझती नहीं। इसका आशय यह है कि ईश्वर का प्रकाश (कृपा, ज्ञान, प्रेम) सर्वव्यापी और अनंत है तथा भक्त के हृदय में उनके प्रति प्रेम और भक्ति की लौ भी सदा जलती रहती है, कभी मंद नहीं पड़ती।
4. ऐसी लाल तुझ बिनु कउनु करे
भाव:- इस पंक्ति में 'लाल' शब्द ईश्वर के लिए प्रयुक्त हुआ है, जो प्रेम और आत्मीयता सूचक है। भाव यह है कि "हे मेरे प्यारे प्रभु! मेरे ऊपर इतनी अधिक कृपा और दया, तेरे अलावा और कौन कर सकता है?" रैदास कहते हैं कि उन पर जो अनुग्रह हुआ है, जो सम्मान मिला है, वह सब केवल ईश्वर की असीम दया का परिणाम है। उनकी यह कृपा सदा बनी रहे, यही भक्त की कामना है।
5. नीचहु ऊच करे मेरा गोबिंदु काहू ते न डरै
भाव:- इस पंक्ति का भाव बहुत शक्तिशाली और समाज सुधार का संदेश देने वाला है। रैदास कहते हैं कि "मेरे गोविंद (ईश्वर) नीच को भी ऊँचा बना सकते हैं और वे किसी से भी नहीं डरते।"
यहाँ 'नीच' और 'ऊच' शब्द सामाजिक हैसियत की ओर संकेत करते हैं। रैदास का कहना है कि ईश्वर की कृपा से समाज में जिन्हें निम्न, हीन या अछूत समझा जाता है, वे भी उच्च पद और सम्मान प्राप्त कर सकते हैं। ईश्वर सर्वशक्तिमान है, वह किसी के बनाए हुए सामाजिक नियमों या भेदभाव से बंधा नहीं है, इसलिए वह किसी से नहीं डरता और न्याय करने में सक्षम है।
उत्तर:- रैदास के ये पद भक्ति साहित्य के श्रेष्ठ उदाहरण हैं, जो दो प्रमुख विचारों को केंद्र में रखते हैं: ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम-भक्ति और सामाजिक समानता एवं न्याय की माँग।
पहले पद का केंद्रीय भाव: पहला पद भक्त और भगवान के अटूट, प्राकृतिक और पूरक संबंध को दर्शाता है। रैदास चंदन-पानी, चाँद-चकोर, दीपक-बाती जैसे उदाहरणों के माध्यम से यह स्पष्ट करते हैं कि जिस तरह ये जोड़े एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं, उसी तरह भक्त का अस्तित्व भी ईश्वर के बिना अर्थहीन है। यह पद श्रद्धा, समर्पण और आत्मनिवेदन की भावना से ओत-प्रोत है।
दूसरे पद का केंद्रीय भाव: दूसरा पद एक सशक्त सामाजिक संदेश देता है। इसमें रैदास ईश्वर को 'गरीब निवाजु' कहकर उनकी न्यायप्रियता का गुणगान करते हैं। वे उस समय की कुरीति 'छुआछूत' और जातिगत भेदभाव पर प्रहार करते हैं। उनका कहना है कि ईश्वर किसी भेदभाव को नहीं मानता और गरीब-दलितों पर भी उतनी ही कृपा करता है। "नीचहु ऊच करे" कहकर वे ईश्वर की शक्ति के माध्यम से एक समतामूलक समाज की स्थापना की कामना करते हैं।
संक्षेप में: इन पदों के माध्यम से रैदास एक ओर जहाँ व्यक्तिगत आध्यात्मिकता और ईश्वर-प्रेम का मार्ग दिखाते हैं, वहीं दूसरी ओर वे सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध आवाज उठाकर मानवीय समानता और गरिमा का संदेश देते हैं। यही इन पदों का मूल सार है।
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