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मेरा छोटा-सा निजी पुस्तकालय - धर्मवीर भारती
उत्तर:- लेखक को लगातार तीन गंभीर हृदयाघात हुए थे, जिससे उनकी नब्ज़ और साँस रुक गई थी। कई डॉक्टरों ने तो उन्हें मृत तक मान लिया था। डॉक्टर बोर्जेस द्वारा दिए गए उच्च वोल्टेज के शॉक्स से वे वापस जीवित तो हो गए, लेकिन उनका लगभग साठ प्रतिशत हृदय स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो गया था। शेष बचे चालीस प्रतिशत हृदय पर भी तीन रुकावटें (ब्लॉकेज) थीं। इतनी जोखिम भरी स्थिति में किसी भी डॉक्टर के लिए ऑपरेशन करना बहुत खतरनाक था, इसलिए वे सभी हिचकिचा रहे थे। अंत में यह निर्णय लिया गया कि पहले अन्य हृदय रोग विशेषज्ञों की राय ली जाए और कुछ दिन बाद ऑपरेशन के बारे में सोचा जाए।
उत्तर:- लेखक के मन में अपनी पुस्तकों के प्रति गहरा स्नेह और आत्मीय जुड़ाव की भावना थी। वह अपने पुस्तकालय को केवल किताबों का ढेर नहीं, बल्कि अपने जीवन का एक सजीव हिस्सा मानते थे। उनका मानना था कि उनके प्राण उन हज़ारों पुस्तकों में बसे हुए हैं। बीमारी की अवस्था में भी वे उन पुस्तकों से घिरे रहना चाहते थे ताकि उन्हें देखकर, उनकी उपस्थिति महसूस करके, उन्हें सांत्वना और शक्ति मिल सके। यह कमरा उनके लिए एक शारीरिक स्थान से अधिक, एक आध्यात्मिक और मानसिक आश्रय स्थल था।
उत्तर:- लेखक के घर नियमित रूप से कई पत्र-पत्रिकाएँ आती थीं। इनमें प्रमुख थीं - आर्यमित्र (साप्ताहिक पत्रिका), वेदोदम, सरस्वती, गृहणी। इसके अलावा, लेखक के लिए विशेष रूप से दो बाल पत्रिकाएँ भी आती थीं - बालसखा और चमचम।
उत्तर:- लेखक में पढ़ने और किताबें जमा करने का शौक उनके बचपन के वातावरण और अनुभवों से पैदा हुआ। उनके पिता नियमित रूप से घर पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाएँ मँगवाते थे। लेखक के लिए आने वाली बाल पत्रिकाओं बालसखा और चमचम में छपी राजकुमारों, परियों और रोमांचक कहानियों ने उनमें पढ़ने की ललक जगाई। एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब पाँचवीं कक्षा में प्रथम आने पर उन्हें स्कूल से इनाम के रूप में अंग्रेजी की दो ज्ञानवर्धक पुस्तकें मिलीं। इन पुस्तकों ने उनके सामने ज्ञान की एक नई दुनिया खोल दी। पिता ने इन दोनों पुस्तकों को एक अलमारी के खाने में रखते हुए औपचारिक रूप से उनके 'निजी पुस्तकालय' की घोषणा की। पिता के इस प्रोत्साहन और प्रेरणा ने लेखक में किताबें सहेजने और संग्रह करने की आजीवन आदत डाल दी।
उत्तर:- लेखक की माँ इसलिए चिंतित रहती थीं क्योंकि लेखक का पूरा ध्यान और समय स्कूल की पाठ्यपुस्तकों की बजाय बाल पत्रिकाओं और अन्य कहानियों को पढ़ने में लगा रहता था। माँ को डर था कि इस तरह पढ़ाई से मन हटने और कल्पनाओं में खोए रहने से उनका बेटा पढ़ाई-लिखाई में पिछड़ जाएगा और भविष्य बर्बाद हो जाएगा। उनका साधारण-सा विश्वास था कि जीवन में सफलता पाने के लिए स्कूल की औपचारिक शिक्षा ही मुख्य आधार है, और उसी पर ध्यान देना चाहिए।
उत्तर:- पाँचवीं कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करने पर लेखक को स्कूल से इनाम के रूप में अंग्रेजी की दो सुंदर पुस्तकें मिलीं। एक पुस्तक विभिन्न पक्षियों के बारे में थी और दूसरी जहाजों और समुद्र के रोमांचक संसार के बारे में थी। ये पुस्तकें केवल जानकारी ही नहीं देती थीं, बल्कि रंगीन चित्रों और आकर्षक विवरणों के साथ प्रस्तुत की गई थीं। इन्हें पढ़कर लेखक को पहली बार एहसास हुआ कि किताबें स्कूल के सिलेबस से बाहर भी एक विशाल और मनोरम ज्ञान का संसार होती हैं। पिता ने इन दोनों पुस्तकों को एक अलग खाने में सजाकर रखा और उन्हें लेखक का 'निजी पुस्तकालय' घोषित किया। इस घटना ने लेखक के लिए साहित्य और ज्ञान की एक ऐसी नई दुनिया के द्वार खोल दिए, जिसमें प्रवेश करके वह जीवनभर के लिए अभ्यस्त हो गया।
उत्तर:- पिता के इस साधारण-से लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण कथन ने लेखक के मन में दो बातों की गहरी प्रेरणा भरी। पहली, इसने एक बच्चे की निजी पहचान और स्वामित्व की भावना को बल दिया। वह खाना और उसमें रखी किताबें 'उसकी अपनी' थीं, यह एहसास उसे गर्व और जिम्मेदारी से भर गया। दूसरी और सबसे बड़ी प्रेरणा यह थी कि इसने लेखक में पुस्तकों को इकट्ठा करने, उनकी देखभाल करने और अपने संग्रह को बढ़ाने की एक सच्ची ललक पैदा कर दी। यही वह बीज था जिसने आगे चलकर एक छोटे से खाने को एक विशाल निजी पुस्तकालय के रूप में विकसित होने का मार्ग दिखाया।
उत्तर:- लेखक द्वारा अपनी पहली पुस्तक खरीदने की घटना बहुत ही मार्मिक और शिक्षाप्रद है। पिता के निधन के बाद आर्थिक तंगी के दिनों में, लेखक राम ट्रस्ट की छात्रवृत्ति से सैकंड-हैंड पाठ्यपुस्तकें खरीदता था। इंटरमीडिएट पास करने के बाद, उसने अपनी पुरानी किताबें बेचकर बी.ए. की किताबें खरीदीं, जिससे दो रुपये बच गए। उस समय प्रसिद्ध फिल्म 'देवदास' चल रही थी, जिसे देखने की लेखक की बहुत इच्छा थी, लेकिन माँ फिल्मों के पक्ष में नहीं थीं। एक दिन लेखक फिल्म का गाना "दुख के दिन बीतत नाही..." गुनगुना रहा था। माँ ने सांत्वना देते हुए कहा कि दुख के दिन भी बीत जाते हैं। जब लेखक ने बताया कि यह फिल्म का गाना है, तो माँ ने दयावश उसे फिल्म देखने की अनुमति दे दी।
लेखक फिल्म देखने जा रहा था कि रास्ते में ही एक किताबों की दुकान पर उसकी नजर शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास 'देवदास' पर पड़ी। फिल्म देखने के बजाय, उसने उस पुस्तक को महज दस आने (या 0.625 रुपये) में खरीद लिया और बचे हुए पैसे माँ के हाथ में रख दिए। इस प्रकार, साहित्य के प्रति प्रेम और ललक ने मनोरंजन पर विजय पाई और लेखक ने अपने जीवन की पहली स्वेच्छा से खरीदी गई पुस्तक का स्वामित्व प्राप्त किया।
उत्तर:- इस कथन का आशय यह है कि लेखक अपने विशाल पुस्तक संग्रह के बीच स्वयं को एकांतवासी या अकेला महसूस नहीं करते, बल्कि पूर्णता और आनंद की अनुभूति करते हैं। उनके पास हिंदी-अंग्रेजी के साहित्य, इतिहास, कला, दर्शन आदि विविध विषयों की हजारों पुस्तकें हैं, जिनमें विश्व के महान लेखकों, विचारकों और कलाकारों की बुद्धिमत्ता और अनुभव समाहित हैं। बीमारी में भी जब वे इन पुस्तकों से घिरे रहते हैं, तो उन्हें लगता है मानो वे इन महान हस्तियों की सानिध्य और संगत में हैं। प्रत्येक पुस्तक उनके लिए एक स्मृति, एक संघर्ष या एक सुखद अनुभव की कहानी लिए होती है। इसलिए, इन 'कृतियों' यानी पुस्तकों के बीच रहकर उनका मन ज्ञान, स्मृतियों और आत्मीयता से इतना 'भरा-भरा' रहता है कि उन्हें किसी प्रकार की कमी या खालीपन का एहसास नहीं होता।
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