UP Board Class 10 Hindi 11. रामवृझ बेनीपुरी - बालगोबिन भगत is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. Class 10 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
उत्तर:- बालगोबिन भगत एक गृहस्थ किसान थे, लेकिन उनके चरित्र में ऐसे सात्विक गुण थे जो आमतौर पर साधु-संतों में देखे जाते हैं। ये विशेषताएँ निम्नलिखित थीं:
उत्तर:- भगत की पुत्रवधू उन्हें अकेले छोड़कर जाना नहीं चाहती थी क्योंकि उसके पति (भगत के पुत्र) की मृत्यु के बाद वही बूढ़े भगत का एकमात्र सहारा थी। उसे यह चिंता सताती थी कि अगर वह भी चली गई, तो बूढ़े ससुर के लिए भोजन कौन बनाएगा? यदि वे बीमार पड़ गए, तो उनकी देखभाल और सेवा कौन करेगा? उसके जाने के बाद भगत की देखरेख करने वाला कोई नहीं था, इसलिए वह उन्हें अकेला छोड़ने को तैयार नहीं थी।
उत्तर:- अपने बेटे की मृत्यु पर भगत ने सामान्य शोक मनाने की बजाय एक दार्शनिक दृष्टिकोण अपनाया। उन्होंने पुत्र के शरीर को एक चटाई पर लिटाकर सफेद चादर से ढक दिया और उसके सामने बैठकर कबीर के भक्ति गीत गाने लगे। उनकी भावना थी कि उनके बेटे की आत्मा अब परमात्मा से मिल गई है, ठीक वैसे ही जैसे कोई विरहिणी अपने प्रियतम से जा मिलती है। उनके लिए यह मिलन एक आनंद का अवसर था, दुख का नहीं। इस प्रकार उन्होंने शरीर की नश्वरता और आत्मा की अमरता में अपने गहरे विश्वास को व्यक्त किया।
उत्तर:-
बालगोबिन भगत का व्यक्तित्व :
बालगोबिन भगत गृहस्थ होते हुए भी सच्चे अर्थों में एक संन्यासी थे। उनका जीवन सादगी, सच्चाई और ईश्वर भक्ति से परिपूर्ण था। वे कबीर के आदर्शों का पालन करते थे और कभी झूठ नहीं बोलते थे। दूसरों की वस्तु को बिना पूछे हाथ न लगाना उनका सिद्धांत था। वे एक मधुर गायक थे; कबीर के पद उनके कंठ से निकलकर सजीव हो उठते थे। उनके वैराग्य का परिचय इस बात से मिलता है कि उन्होंने अपने पुत्र के श्राद्ध के बाद पुत्रवधू को उसके मायके भेज दिया और उसके दूसरे विवाह का आदेश दिया, ताकि उसका जीवन सुखपूर्वक बीत सके।
बालगोबिन भगत की वेशभूषा :
भगत मँझोले कद के गोरे-चिट्टे व्यक्ति थे। उनकी उम्र साठ वर्ष से ऊपर थी और बाल पक गए थे। वे लंबी दाढ़ी या जटाएँ नहीं रखते थे, लेकिन उनका चेहरा सफेद बालों से हमेशा जगमगाता रहता था। कपड़े बहुत कम पहनते थे – केवल कमर में एक लंगोटी और सिर पर कबीरपंथियों जैसी कनफटी टोपी। सर्दी में एक काली कमली ओढ़ लेते थे। माथे पर रामानंदी चंदन का लंबा तिलक होता था और गले में तुलसी की जड़ों की माला पहने रहते थे।
उत्तर:- बालगोबिन भगत की दिनचर्या लोगों के लिए आश्चर्य का विषय इसलिए थी क्योंकि वृद्धावस्था में भी उनमें अद्भुत स्फूर्ति और अनुशासन था। सर्दियों की कड़कड़ाती ठंड या भादों की अंधेरी रातों में भी वे भोर से पहले उठकर गाँव से दो मील दूर गंगा में स्नान करने जाते थे। खेत में काम करते हुए वे कबीर के गीत गाते रहते, जिससे उनका कार्य भी हो जाता और भक्ति भी। मौसम चाहे जैसा भी हो, उनकी दिनचर्या में कभी कोई बदलाव नहीं आता था। एक बुजुर्ग व्यक्ति का इतना अनुशासित, ऊर्जावान और ईश्वरमय जीवन देखकर लोग हैरान रह जाते थे।
उत्तर:- बालगोबिन भगत के गायन में एक जादुई आकर्षण था। उनकी गायन की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार थीं:
उत्तर:- बालगोबिन भगत रूढ़िवादी सामाजिक परंपराओं से अलग थे। यह निम्नलिखित प्रसंगों से स्पष्ट होता है:
उत्तर:- आषाढ़ का महीना, रिमझिम बारिश और हरियाली से भरे खेतों में धान की रोपाई चल रही होती थी। ऐसे में बालगोबिन भगत का मधुर स्वर पूरे वातावरण को मंत्रमुग्ध कर देता था। उनके गीत की लय के साथ हलवाहों के पैर ताल से उठने लगते थे। रोपाई करने वालों की उँगलियाँ एक विशेष ताल में चलने लगती थीं, मानो वे भगत के स्वरों के साथ नृत्य कर रही हों। स्त्रियाँ अपने आप ही गुनगुनाने लगती थीं। बादलों से घिरे आसमान के नीचे, ठंडी हवा और फुहारों के बीच भगत का संगीत एक ऐसा जादू बुन देता था कि सारा वातावरण आनंद और भक्ति में डूब जाता था।
उत्तर:- बालगोबिन भगत के जीवन के हर पहलू में कबीर के प्रति उनकी श्रद्धा झलकती है:
उत्तर:- मेरे विचार से भगत की कबीर पर अगाध श्रद्धा के निम्न कारण रहे होंगे:
उत्तर:- भारत एक कृषि प्रधान देश है और आषाढ़ का महीना खेती-किसानी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। आषाढ़ चढ़ते ही वर्षा ऋतु की शुरुआत होती है, जो खेतों में नमी और हरियाली लाती है। यही वह समय होता है जब धान की रोपाई शुरू होती है। बालगोबिन भगत के मधुर गीत इस उल्लास को और बढ़ा देते थे। उनके गीतों से प्रेरित होकर खेतों में काम कर रहे स्त्री-पुरुष भी गुनगुनाने लगते थे। बच्चे बारिश में भीगने और खेलने का आनंद लेते थे। किसानों को अच्छी फसल की आशा बँधती थी। इस प्रकार, प्रकृति की हरियाली, वर्षा की फुहारें और सामूहिक श्रम का उत्साह मिलकर गाँव के परिवेश को खुशी और उमंग से भर देते थे।
उत्तर:- नहीं, साधु की पहचान केवल उसके पहनावे (जैसे केसरिया वस्त्र, लंबी दाढ़ी) के आधार पर नहीं की जानी चाहिए। असली साधुत्व तो मन और आचरण में होता है। मेरे अनुसार, किसी व्यक्ति को साधु तभी कहा जा सकता है जब उसमें निम्नलिखित गुण हों:
उत्तर:- मोह स्वार्थपूर्ण आसक्ति है, जबकि प्रेम निस्वार्थ हित की भावना है। भगत के जीवन की वह घटना इस कथन को सिद्ध करती है जब उन्होंने अपनी पुत्रवधू को उसके भाई के साथ भेजकर उसका दूसरा विवाह करने का निर्णय लिया। मोहवश वे चाहते तो उसे अपने साथ रोक सकते थे ताकि उनकी सेवा होती रहे। लेकिन उन्होंने सच्चे प्रेम का परिचय देते हुए पुत्रवधू के भविष्य और सुख के बारे में सोचा। उन्होंने अपनी सुविधा से ऊपर उठकर उसके नए जीवन का मार्ग प्रशस्त किया। यही निस्वार्थ प्रेम, स्वार्थपूर्ण मोह से भिन्न है।
उत्तर:-
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