UP Board Class 10 Hindi 16. यतींद्र मिश्र - नौबतखाने में इबादत is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. Class 10 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
उत्तर: शहनाई की दुनिया में डुमराँव को दो प्रमुख कारणों से याद किया जाता है। पहला कारण यह है कि विश्वविख्यात शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ का जन्म इसी गाँव में हुआ था। दूसरा कारण यह है कि शहनाई बजाने के लिए आवश्यक 'रीड' (नरकट) नामक विशेष घास सोन नदी के किनारे डुमराँव में ही पाई जाती है। यह रीड शहनाई की मधुर ध्वनि का आधार है। इस प्रकार, डुमराँव शहनाई के इतिहास और निर्माण दोनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
उत्तर: शहनाई को भारतीय संस्कृति में एक मंगल वाद्य माना जाता है, जिसे विवाह, मंदिरों में पूजा और राष्ट्रीय पर्व जैसे शुभ अवसरों पर ही बजाया जाता है। बिस्मिल्ला खाँ ने अपने अद्भुत कौशल से इस वाद्य को न केवल भारत में, बल्कि विश्व स्तर पर प्रतिष्ठा दिलाई। उन्होंने 15 अगस्त 1947 की पहली सुबह लाल किले पर और 26 जनवरी को शहनाई बजाकर इसकी मंगलध्वनि को राष्ट्रीय गौरव से जोड़ा। इस प्रकार, शहनाई की मंगलमयी पहचान को स्थापित करने और उसे शिखर तक पहुँचाने में उनका योगदान अतुलनीय है, इसीलिए उन्हें 'शहनाई की मंगलध्वनि का नायक' कहा गया है।
उत्तर: 'सुषिर-वाद्य' का अभिप्राय उन वाद्ययंत्रों से है जिन्हें फूँक मारकर बजाया जाता है। इनमें हवा भरने के लिए छिद्र (सुराख़) होते हैं, जैसे- बाँसुरी, शहनाई, मोहनवीणा आदि।
शहनाई को 'सुषिर वाद्यों में शाह' (बादशाह) की उपाधि इसलिए दी गई होगी क्योंकि यह अपनी समृद्ध, मधुर और ओजस्वी ध्वनि के कारण अन्य सभी फूँककर बजाए जाने वाले वाद्यों में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। इसकी ध्वनि में एक विशेष प्रकार का 'नय' (स्वर) होता है, जो इसे अद्वितीय बनाता है और इसीलिए इसे 'शाह-ए-नय' यानी 'स्वरों का बादशाह' कहा जाता है।
उत्तर: इस कथन के माध्यम से बिस्मिल्ला खाँ ने संगीत के 'सुर' (स्वर) को भौतिक वस्तुओं से कहीं अधिक मूल्यवान बताया है। उनका आशय है कि फटे हुए कपड़े (लुंगिया) को सिलकर या बदलकर ठीक किया जा सकता है, लेकिन यदि किसी कलाकार का 'सुर' खराब (फटा) हो जाए, तो उसे दोबारा ठीक नहीं किया जा सकता। एक कलाकार की पहचान और सम्मान उसके सुरों पर ही निर्भर करता है। इसलिए वे ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि चाहे उन्हें अच्छे कपड़े (धन-दौलत) न भी मिले, लेकिन उनका सुर हमेशा शुद्ध और उत्तम बना रहे।
उत्तर: इस प्रार्थना के माध्यम से बिस्मिल्ला खाँ एक सच्चे कलाकार की आकांक्षा व्यक्त करते हैं। वे ईश्वर से केवल अच्छा सुर ही नहीं, बल्कि एक ऐसा जादुई और प्रभावशाली सुर माँगते हैं जिसमें श्रोताओं के हृदय को छू लेने की शक्ति हो। उनका सपना है कि उनकी शहनाई का संगीत इतना मार्मिक और भावपूर्ण हो कि सुनने वालों की आँखों से स्वतः ही, बिना किसी बनावट के, सच्चे मोती के समान आँसू निकल आएँ। यही उनके संगीत की सर्वोच्च सफलता होगी।
उत्तर: बिस्मिल्ला खाँ काशी की पुरानी संस्कृति और परंपराओं के लुप्त होते जाने से बहुत दुखी थे। उन्हें व्यथित करने वाले परिवर्तन थे:
1. खान-पान की परंपरा का कमजोर पड़ना: कुलसुम की छनकती हुई कचौड़ी और देशी घी की जलेबी जैसे स्वादिष्ट व्यंजन अब नहीं मिलते थे।
2. सांस्कृतिक मूल्यों का ह्रास: संगीत, साहित्य और शिष्टाचार (अदब) की समृद्ध परंपरा में गिरावट आ रही थी।
3. साम्प्रदायिक सौहार्द में कमी: पहले जैसा प्रगाढ़ प्यार और भाईचारा हिंदू और मुसलमानों के बीच कम देखने को मिलता था।
4. कलाकारों के प्रति सम्मान में कमी: मुख्य कलाकारों द्वारा संगत करने वाले कलाकारों (जैसे तबला वादक) के प्रति सम्मान की भावना घट रही थी।
इन सभी बदलावों से खाँ साहब को लगता था कि काशी की वह पुरानी पहचान और आत्मा धीरे-धीरे खो रही है।
उत्तर: निम्नलिखित प्रसंग सिद्ध करते हैं कि बिस्मिल्ला खाँ मिली-जुली (सांप्रदायिक सद्भाव की) संस्कृति के प्रतीक थे:
• इस्लाम के प्रति निष्ठा: वे एक धार्मिक मुसलमान थे, पाँचों वक्त नमाज़ अदा करते थे और मुहर्रम के दिनों में शोक मनाते हुए नौहा बजाते थे।
• हिंदू देवस्थानों के प्रति श्रद्धा: उनकी काशी विश्वनाथ जी और बालाजी मंदिर के प्रति अगाध श्रद्धा थी। जब भी वे काशी से बाहर होते, तो इन मंदिरों की दिशा की ओर मुँह करके ही शहनाई बजाना शुरू करते थे।
• काशी से अटूट लगाव: वे अक्सर कहते थे - "काशी छोड़कर कहाँ जाए, गंगा मइया यहाँ, बाबा विश्वनाथ यहाँ... मरते दम तक न यह शहनाई छूटेगी न काशी।"
इस प्रकार, उनके व्यक्तित्व में हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों की आस्था और संस्कृति का अद्भुत मेल देखने को मिलता है।
उत्तर: बिस्मिल्ला खाँ के जीवन के निम्नलिखित पहलू यह सिद्ध करते हैं कि वे वास्तव में एक सच्चे और महान इंसान थे:
• सादगी और विनम्रता: भारत रत्न जैसे सर्वोच्च सम्मान से विभूषित होने के बाद भी वे पैबंद लगी लुंगी पहनते रहे। उनमें अहंकार का लेशमात्र भी नहीं था।
• मानवता को सर्वोपरि रखना: वे धार्मिक कर्मकांड से ऊपर उठकर इंसानियत, प्रेम और भाईचारे को अधिक महत्व देते थे।
• कला के प्रति समर्पण: उनके लिए धन-दौलत से कहीं अधिक महत्वपूर्ण था उनका 'सुर'। वे कला के सच्चे साधक थे।
• सरल और निश्छल स्वभाव: वे बनावट और दिखावे से कोसों दूर रहते थे और हमेशा सीधे-सादे तरीके से जीवन जीते थे।
उत्तर: बिस्मिल्ला खाँ की संगीत साधना को समृद्ध करने में निम्नलिखित व्यक्तियों और घटनाओं का विशेष योगदान रहा:
1. रसूलनबाई और बतूलनबाई: बालाजी मंदिर जाते समय इन गायिका बहनों के घर से आती ठुमरी, दादरा की मधुर आवाज़ें सुनकर उनके मन में संगीत के प्रति ललक जागी।
2. उनके नाना (मातृकुल): बचपन में वे चोरी-चोरी अपने नाना को शहनाई बजाते सुनते और उनकी मीठी शहनाई ढूँढते रहते थे। यही उनकी प्रारंभिक प्रेरणा थी।
3. उनके मामूजान अलीबख्श: जब मामूजान शहनाई बजाते-बजाते 'सम' (ताल का अंतिम और महत्वपूर्ण क्षण) पर पहुँचते, तो बिस्मिल्ला खाँ जमीन पर पत्थर मारकर दाद (प्रशंसा) देते। इससे उन्हें संगीत की गहरी समझ और प्रतिक्रिया देने का तरीका सीखने को मिला।
4. कुलसुम की कचौड़ी: कुलसुम के हलवाई की दुकान पर कचौड़ी तलने की छनछनाहट में भी वे संगीत के आरोह-अवरोह (स्वरों के चढ़ाव-उतार) को सुनने और समझने लगे थे।
5. बालाजी मंदिर में अभ्यास: बचपन में बालाजी मंदिर पर रोज़ शहनाई बजाने का नियमित अभ्यास उनकी कला को निखारने और पक्का करने का आधार बना।
उत्तर: बिस्मिल्ला खाँ के व्यक्तित्व की निम्नलिखित विशेषताएँ अत्यंत प्रभावशाली हैं:
1. सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतीक: मुस्लिम होते हुए भी हिंदू देवस्थानों के प्रति उनकी गहरी श्रद्धा भारत की साझा संस्कृति की मिसाल है।
2. अद्भुत सादगी और विनम्रता: भारत रत्न जैसा बड़ा पुरस्कार मिलने के बाद भी पैबंद लगी लुंगी पहनना उनकी सरलता और अहंकारहीनता को दर्शाता है।
3. कला के प्रति अनन्य समर्पण: उनका यह विश्वास कि कचौड़ी तलने की आवाज़ में भी संगीत छिपा है, यह दर्शाता है कि संगीत उनके लिए सिर्फ एक कला नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक तरीका था।
4. मातृभूमि और अपनी कला से अटूट लगाव: "न शहनाई छूटेगी, न काशी" - यह कथन उनकी जड़ों और अपनी विरासत के प्रति गर्व तथा प्रेम को प्रकट करता है।
उत्तर: मुहर्रम का पर्व बिस्मिल्ला खाँ के जीवन और उनकी कला से गहराई से जुड़ा हुआ था। मुहर्रम शिया मुसलमानों का एक शोकपूर्ण पर्व है, जिसमें वे इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत को याद करते हैं। इस पूरे महीने में खाँ साहब का परिवार कोई भी मनोरंजक संगीत नहीं बजाता था। लेकिन मुहर्रम की आठवीं तारीख उनके लिए विशेष थी। इस दिन वे खड़े होकर शहनाई बजाते थे और 'नौहा' (शोक गीत) की मार्मिक धुनें निकालते हुए, आँसू बहाते हुए, दालमंडी में फातमान तक लगभग आठ किलोमीटर पैदल चलते थे। इन दिनों वे कोई राग-रागिनी नहीं, बल्कि केवल भावपूर्ण और दुख व्यक्त करने वाली धुनें ही बजाते थे। इस प्रकार, मुहर्रम के प्रति उनकी आस्था और उनकी कला का एक अटूट रिश्ता था।
उत्तर: यह कथन पूर्णतः सत्य है कि बिस्मिल्ला खाँ कला के अनन्य (एकनिष्ठ) उपासक थे। इसके निम्नलिखित तर्क हैं:
1. जीवनभर सीखने की ललक: उन्होंने लगभग अस्सी वर्षों तक संगीत को पूरी तन्मयता और एकाधिकार (गहनता) से सीखने की जिजीविषा (इच्छा) को अपने भीतर जिंदा रखा। वे कभी भी अपने को पूर्ण नहीं मानते थे।
2. सुर को सर्वोच्च स्थान: उनकी प्रार्थना "फटा सुर न बख्शें... लुंगिया का क्या है" सिद्ध करती है कि उनके लिए धन-दौलत और भौतिक सुख-सुविधाएँ, उनके सुर (कला) के सामने तुच्छ थीं।
3. कला के लिए ईश्वर से विनती: वे ईश्वर से सच्चा और प्रभावशाली सुर माँगते थे ताकि उनका संगीत श्रोताओं के हृदय को छू सके। यह एक सच्चे साधक की भावना है।
4. कला को जीवन में देखना: उनके लिए संगीत सिर्फ मंच तक सीमित नहीं था; वे कचौड़ी तलने की आवाज़ में भी संगीत के सुर तलाश लेते थे।
इन सभी बातों से स्पष्ट है कि बिस्मिल्ला खाँ ने अपना सम्पूर्ण जीवन कला की साधना को समर्पित कर दिया था और वे एक सच्चे कला-उपासक थे।
1. यह जरुर है कि शहनाई और डुमराँव एक-दूसरें के लिए उपयोगी हैं।
उपवाक्य: कि शहनाई और डुमराँव एक-दूसरें के लिए उपयोगी हैं।
भेद: संज्ञा उपवाक्य (क्योंकि यह 'यह' सर्वनाम की विशेषता बता रहा है)।
2. रीड अंदर से पोली होती है जिसके सहारे शहनाई को फूँका जाता है।
उपवाक्य: जिसके सहारे शहनाई को फूँका जाता है।
भेद: विशेषण उपवाक्य (क्योंकि यह 'रीड' संज्ञा की विशेषता बता रहा है)।
3. रीड नरकट से बनाई जाती है जो डुमराँव में मुख्यतः सोन नदी के किनारों पर पाई जाती है।
उपवाक्य: जो डुमराँव में मुख्यतः सोन नदी के किनारों पर पाई जाती है।
भेद: विशेषण उपवाक्य (क्योंकि यह 'नरकट' संज्ञा की विशेषता बता रहा है)।
4. उनको यकीन है, कभी खुदा यूँ ही उन पर मेहरबान होगा।
उपवाक्य: कभी खुदा यूँ ही उन पर मेहरबान होगा।
भेद: संज्ञा उपवाक्य (क्योंकि यह 'यकीन' संज्ञा की पूर्ति कर रहा है)।
5. हिरन अपनी महक से परेशान पूरे जंगल में उस वरदान को खोजता है जिसकी गमक उसी में समाई है।
उपवाक्य: जिसकी गमक उसी में समाई है।
भेद: विशेषण उपवाक्य (क्योंकि यह 'वरदान' संज्ञा की विशेषता बता रहा है)।
6. खाँ साहब की सबसे बड़ी देन हमें यही है कि पूरे अस्सी बरस उन्होंने संगीत को संपूर्णता व एकाधिकार से सीखने की जिजीविषा को अपने भीतर जिंदा रखा।
उपवाक्य: कि पूरे अस्सी बरस उन्होंने संगीत को संपूर्णता व एकाधिकार से सीखने की जिजीविषा को अपने भीतर जिंदा रखा।
भेद: संज्ञा उपवाक्य (क्योंकि यह 'यही' सर्वनाम की विशेषता बता रहा है)।
1. इसी बालसुलभ हँसी में कई यादें बंद है।
उत्तर: यह ऐसी बालसुलभ हँसी है जिसमें कई यादें बंद हैं।
2. काशी में संगीत आयोजन की एक प्राचीन एवं अद्भुत परंपरा है।
उत्तर: काशी में जो संगीत समारोह आयोजित किए जाते हैं, उनकी एक प्राचीन एवं अद्भुत परंपरा है।
3. धत्! पगली ई भारतरत्न हमको शहनईया पे मिला है, लुंगिया पे नहीं।
उत्तर: धत्! पगली, ई जो भारतरत्न हमको मिला है, वह शहनईया पे मिला है, लुंगिया पे नहीं।
4. काशी का नायाब हीरा हमेशा से दो कौमों को एक होकर आपस में भाईचारे के साथ रहने की प्रेरणा देता रहा।
उत्तर: काशी का वह नायाब हीरा है जो हमेशा से दो कौमों को एक होकर आपस में भाईचारे के साथ रहने की प्रेरणा देता रहा।
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