UP Board Class 10 Hindi 2. आज्ञा गुरूणां हि अविचारणीया is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. Class 10 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
एक नगर में चन्द्र नामक राजा रहता था। उसके पुत्र बन्दरों के साथ खेलने में लगे रहते थे और उन्हें तरह-तरह के स्वादिष्ट भोजन देकर मोटा-ताजा करते थे। उसी राजमहल में राजकुमारों की सवारी के लिए भेड़ों का एक समूह भी रखा गया था। उन भेड़ों में से एक भेड़ अपनी जीभ के लालच के कारण दिन-रात रसोईघर में घुस जाती और जो कुछ भी देखती, उसे चट कर जाती। रसोइए उसे देखते ही लकड़ी, मिट्टी के बर्तन या काँसे-ताँबे के पात्र जो भी हाथ लगता, उसी से उसे तुरन्त पीटने लगते।
भेड़ और रसोइयों के इस निरन्तर झगड़े को देखकर, नीतिज्ञों में श्रेष्ठ बन्दरों के नेता (यूथपति) ने सोचा—'इनका यह विवाद बन्दरों के भले के लिए नहीं है।' ऐसा विचार करके उस समूह के स्वामी ने सभी बन्दरों को एकान्त में बुलाकर कहा—
रसोइयों और भेड़ के बीच का यह झगड़ा निश्चित ही तुम सबके विनाश का कारण बनेगा। क्योंकि कहा गया है—
जिस घर में बिना किसी कारण के रोज झगड़ा होता हो, जीवन की कामना करने वाले व्यक्ति को उस घर को दूर से ही छोड़ देना चाहिए।
तस्मात् स्थात् कलहो यत्र गुहे नित्यमकारण:। तदगृहं जीवितं वाउछन् दूरत: परिवर्जयेत्॥ 1॥
तस्मात् यत्र गृहे- {gj steno अंकारण: कलह: tii) “ee sifad (Gi), ee तत् गृहं 11 1302620620 3200 624 परिवर्जयेत् ।
मज्जूषा- | दूरत:, वाउ्छन्, स्यात्, नित्यम्
उत्तराणि- (i) स्यात्, (ii) नित्यम् (iii) वाउछन् (iv) दूरत:
आज्ञा- आदेश:, आज्ञा (Order)
Fa:- गुरव:, गुरु (Teacher)
aehtery— अहर्निशम्, दिन-रात (Day and night)
सूपकारा:- पाचका:, रसोइए (Cook)
भाजनम्- पात्रम्, बर्तन (Vessel)
आशु- शीघ्रम्, जल्दी (Quickly)
यूथप:- वृन्दरक्षक:, समूह का रक्षक (Protector of the flock)
तस्मात् स्थात् कलहो यत्र गृहे नित्यमकारण:। तदगृहं जीवितं वाउछन् दूरत: परिवर्जयेत्॥ 1॥
मज्जूषा- | अकारण:, सुखी जीवनम्ू कलह:, गृहम्
उत्तराणि- (i) सुखी जीवनम्, (ii) गृहम्, (iii) कलह:, (iv) अकारण:
वानरयूथम् - वानराणाम् यूथम् (षष्ठी तत्पुरुष:)
अहर्निशम् - अह: च निशा च (द्वन्द्व समास:)
सूपकारा: - सूपम् कुर्वन्ति इति (उपपद तत्पुरुष:)
यूथप: - यूथम् पाति इति (उपपद तत्पुरुष:)
कस्मिंश्चितू - कस्मिन् + चित्
चन्द्रो नाम - चन्द्र: + नाम
किड्चित् - किम् + चित्
तदगृहम् - तत् + गृहम्
जीवितं वाउछनू - जीवितम् + वाञ्छन्
लोलुपतया - लोलुप + तल् (तल् प्रत्यय)
विचार्य - वि + चर् + ल्यप् (ल्यप् प्रत्यय)
आहूय - आ + ह्वे + ल्यप् (ल्यप् प्रत्यय)
उक्तम् - वच् + क्त (क्त प्रत्यय)
(1) एकपदेन उत्तरत-
() भूपते: नाम किम् आसीतू ?
उत्तर: चन्द्र:।
(४) क: वानराणां विनाशकारणं भविष्यति ?
उत्तर: कलह:।
(1) पूर्णवाक्येन उत्तरत-
(i) क: रहस्यम् अवदत् ?
उत्तर: यूथप: रहस्यम् अवदत्।
(;) यूथप: कान् रहसि अवदत् ?
उत्तर: यूथप: कपीन् रहसि अवदत्।
(गत) भाषिककार्यम्-
(i) 'एकान्ते' इति अर्थ कि पद प्रयुक्तम् ?
(क) रहसि (ख) अवेक्ष्य (ग) आशु (घ) पुष्टिम्
उत्तर: (क) रहसि।
(४) 'बालवाहनयोग्यम्' इति पदस्य विशेष्यपदं किम् ?
(क) मेषम् (ख) यूथम् (ग) मेषयूथम् (घ) वानरयूथम्
उत्तर: (ग) मेषयूथम्।
(४४) 'ताडयन्ति स्म' इति क्रियाया: कर्तृपदं किम् ?
(क) बालका: (ख) राजपुत्रा: (ग) वानराः (घ) सूपकारा:
उत्तर: (घ) सूपकारा:।
(४४) 'भाजनम्' इति पदस्य पर्यायपदं गद्यांशात् एवं चित्वा लिखत।
(क) कलहं (ख) पात्र (ग) मृणत्यं (घ) काएष्ठं
उत्तर: (ख) पात्र।
(i) यूथप: सर्वान् कपीन् आहूय रहसि अवदतू।
प्रश्न: यूथप: सर्वान् कपीन् आहूय कुत्र अवदत्?
उत्तर: रहसि।
(ii) कस्समिंश्चित् नगरे चन्द्रो नाम भूपति: प्रतिवसति FF
प्रश्न: कस्मिन् नगरे चन्द्रो नाम भूपति: प्रतिवसति स्म?
उत्तर: कस्मिंश्चित्।
(iii) एतेषां कलह: न वानराणां हिताय।
प्रश्न: कस्य कलह: न वानराणां हिताय?
उत्तर: एतेषाम्।
(0) राजपुत्रा: वानरयूथं Fred afte नयन्ति स्म।
प्रश्न: राजपुत्रा: वानरयूथं कै: पुष्टिं नयन्ति स्म?
उत्तर: भोज्यपदार्थै:।
(७) तेन तम् आशु ताडयन्ति स्म।
प्रश्न: तेन तम् आशु किम् कुर्वन्ति स्म?
उत्तर: ताडयन्ति।
इसलिए, कहीं ऐसा न हो कि हम सभी का नाश हो जाए, इस राजभवन को छोड़कर हम वन को चले जाएँ। क्योंकि—झगड़ों से महलों का अन्त हो जाता है, बुरे वचन बोलने से मित्रता समाप्त हो जाती है, दुष्ट शासक से राष्ट्रों का पतन हो जाता है और बुरे कर्मों से मनुष्यों की कीर्ति नष्ट हो जाती है।
'कलहान्तानि हर्म्याणि कुवाक्यान्तं च सौहदम् । कुराजान्तानि राष्ट्राणि कुकर्मान्तं यशो नृणाम्॥ 20’
मज्जूषा | हर्म्याणि, कलहान्तानि, कुवाक्यान्तं, नृणां
उत्तराणि- (i) कलहान्तानि (ii) कुवाक्यान्त॑ (iii) राष्ट्राणि (iv) नृणाम्
ara: — विनाश:, नाश (Destruction)
Featfor— प्रासादा:, महल (Palaces)
सौहदम्- मित्रता, मैत्री (Friendship)
नृणाम्- जनानाम्, लोगों का (Of people)
कलहान्तानि हर्म्याणि कुवाक्यान्तं च सौहदम्। कुराजान्तानि राष्ट्राणि कुकर्मान्तं यशो नृणाम्॥ 2॥
अस्य भावार्थ: अस्ति यत् (i) विवादै: राजप्रासादा: नश्यन्ते । कुवाक्यै: अपभाषणेन वा (ii) मैत्री नश्यते | दुष्टनृपै: (iii) राष्ट्राणि नश्यन्ति। कुकर्मणा (iv) मनुष्याणां यशः नष्टं गच्छति ।
मज्जूषा-| विवादै:, मनुष्याणां, मैत्री, राष्ट्राणि
उत्तराणि- (i) विवादै: (ii) मैत्री (iii) राष्ट्राणि (iv) मनुष्याणां।
राजभवनम् - राज्ञ: भवनम् (षष्ठी तत्पुरुष:)
कुवाक्यम् - कुत्सितं वाक्यम् (कर्मधारय:)
परित्यज्य - परि + त्यज् + ल्यप् (ल्यप् प्रत्यय)
तदेतद् - तत् + एतत् (व्यंजन सन्धि:)
कलहान्तानि. - कलह + अन्तानि (दीर्घ सन्धि:)
कुराजान्तानि - कुराज + अन्तानि (दीर्घ सन्धि:)
कुकर्मान्तं - कुकर्म + अन्तं (दीर्घ सन्धि:)
(1) एकपदेन उत्तरत-
(i) कलहान्तानि कानि त्यजेत्?
उत्तर: हर्म्याणि।
(४४) यूथप: कुत्र गन्तुम् कथयति ?
उत्तर: वनम्।
(1) पूर्णवाक्येन उत्तरत-
(i) क: राजभवनम् त्यक्तुम् कथयति ?
उत्तर: यूथप: राजभवनम् त्यक्तुम् कथयति।
(४) कौदृशम् सौहदम् त्यक्तव्यम् ?
उत्तर: कुवाक्यान्तम् सौहृदम् त्यक्तव्यम्।
(ID) भाषिककार्यम्-
(४) 'नराणाम्' पदस्य अर्थ कि पदम् अत्र प्रदत्तम्?
(क) नृणाम् (ख) सर्वेषाम् (ग) राष्ट्राण (घ) संक्षय:
उत्तर: (क) नृणाम्।
(ii) “यश: ' इति पदे क: मूलशब्द: ?
(क) यश (ख) यशस् (ग) यशो (घ) यशम्
उत्तर: (ख) यशस्।
(ii) 'Taq! इति क्रियाया: कर्तृपदं किम् ?
(क) तत: (ख) सर्वेषाम् (ग) संक्षयम् (घ) संक्षय:
उत्तर: (घ) संक्षय:।
(४0) “कलहान्तानि हर्म्याणि' इति अनयो: पदयो: विशेष्यप्द किम् ?
(क) कलह (ख) अन्तानि (ग) कलहन्तानि (घ) हर्म्याणि
उत्तर: (घ) हर्म्याणि।
(४) वयं राजभवन परित्यज्य बन॑ गच्छाम:।
प्रश्न: वयं राजभवन परित्यज्य कुत्र गच्छाम:?
उत्तर: वनम्।
(४) नृणां यश: कुकर्मणा अन्त भवति।
प्रश्न: नृणां यश: केन अन्त भवति?
उत्तर: कुकर्मणा।
(iii) कलह: हर्म्याणि अन्तानि करोति।
प्रश्न: कलह: कानि अन्तानि करोति?
उत्तर: हर्म्याणि।
(४0) तत: सर्वेषां नाश: न भवेत्।
प्रश्न: तत: केषाम् नाश: न भवेत्?
उत्तर: सर्वेषाम्।
(०) कुवाक्येन सौहदम् नाशं गच्छति।
प्रश्न: केन सौहदम् नाशं गच्छति?
उत्तर: कुवाक्येन।
उस (यूथपति) के वचन को अविश्वसनीय मानकर अभिमान से चूर बन्दर हँसते हुए बोले—"अरे! यह क्या कहा जा रहा है? क्या हम स्वर्ग के समान सुखों को छोड़कर जंगल में खारे, तीखे, कसैले, कड़वे और रूखे फल खाएँगे?" यह सुनकर आँसू भरी आँखों वाला यूथपति गद्गद् स्वर में बोला—"जीभ के स्वाद के लोभी होने के कारण तुम लोग इस सुख के बुरे परिणाम को नहीं जानते। मैं तो वन को जा रहा हूँ।"
mua: — वानरा:, बन्दर (Monkeys)
weet— हसित्वा, हँसकर (After laughing)
विहाय- त्यक्त्वा, छोड़कर (Leaving)
उक्तवान्ू- कथितवान्, कहा (Said)
AT - तस्य वचनम् (षष्ठी तत्पुरुष:)
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