UP Board Class 10 Hindi 2. तुलसीदास - राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. Class 10 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
उत्तर:- परशुराम के क्रोध करने पर लक्ष्मण ने धनुष टूटने के बारे में निम्नलिखित तर्क दिए -
उत्तर:- इस प्रसंग के आधार पर राम और लक्ष्मण के स्वभाव में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है -
राम के स्वभाव की विशेषताएँ: राम अत्यंत विनम्र, धैर्यवान और शांत स्वभाव के हैं। परशुराम के क्रोध पर भी वे शांत रहे और उन्हें 'प्रभु' व 'दास' कहकर संबोधित करते हुए सम्मानपूर्वक अपनी बात रखी। उनकी वाणी मधुर और समझदारी भरी थी, जिससे क्रोधी व्यक्ति को भी शांत करने की क्षमता थी।
लक्ष्मण के स्वभाव की विशेषताएँ: लक्ष्मण उग्र, निडर और व्यंग्य करने वाले स्वभाव के हैं। उन्होंने परशुराम के क्रोध का जवाब हँसकर और तीखे व्यंग्यात्मक तर्कों से दिया। वे बिना डरे स्पष्टवादिता से बोले और परशुराम की धमकियों से भी विचलित नहीं हुए। उनमें युवा साहस और तेजस्विता स्पष्ट झलकती है।
उत्तर:-
लक्ष्मण: हे मुनिवर! आप तो बाल ब्रह्मचारी हैं, फिर इस धनुष के टूटने पर इतना क्रोध क्यों? बचपन में हमने ऐसे न जाने कितने खिलौने तोड़े, पर किसी ने हम पर ऐसा कोप नहीं किया।
परशुराम: अरे राजकुमार! तू अभी बालक है और काल के वश में ऐसी बातें कर रहा है। यह कोई साधारण धनुष नहीं, भगवान शिव का धनुष है! सावधान, मेरे इस परशु (फरसे) को देख! यह गर्भ में पल रहे शिशु तक का नाश करने में सक्षम है।
लक्ष्मण: (हँसते हुए) मुनि जी! आप बार-बार इस फरसे को दिखाकर मुझे डराना चाहते हैं? जिस प्रकार फूँक मारने से पहाड़ नहीं उड़ता, उसी प्रकार मैं आपके इस फरसे से भयभीत नहीं होने वाला।
उत्तर:- दिए गए पद्यांश के आधार पर परशुराम ने स्वयं के बारे में सभा में निम्न बातें कहीं -
1. वे बाल ब्रह्मचारी हैं और उनका स्वभाव अत्यंत क्रोधी है।
2. संपूर्ण विश्व में वे क्षत्रिय कुल के द्रोही (शत्रु) के रूप में प्रसिद्ध हैं।
3. अपने भुजबल से उन्होंने अनेक बार पृथ्वी को क्षत्रिय राजाओं से रहित कर दिया और उसे ब्राह्मणों को दान में दे दिया।
4. उन्होंने अपने परशु (फरसे) से सहस्रबाहु की भुजाएँ काट डाली थीं।
5. उन्होंने लक्ष्मण से कहा कि हे राजपुत्र! मेरे इस भयानक फरसे को अच्छी तरह देख लो। तू अपने माता-पिता को चिंता में डालने का कारण क्यों बन रहा है? मेरा यह फरसा इतना भयानक है कि यह गर्भस्थ शिशु का भी विनाश कर सकता है।
उत्तर:- लक्ष्मण ने वीर योद्धा की निम्नलिखित विशेषताएँ बताई हैं -
उत्तर:- साहस और शक्ति मनुष्य को शारीरिक व मानसिक रूप से सबल बनाते हैं, किंतु यदि इनके साथ विनम्रता न हो तो व्यक्ति अहंकारी और उद्दंड बन सकता है। विनम्रता एक ऐसा गुण है जो साहस और शक्ति को नियंत्रित कर उन्हें सही दिशा देती है। विनम्र व्यक्ति अपनी शक्ति का दुरुपयोग नहीं करता, बल्कि उसका उपयोग दूसरों की रक्षा और सहायता के लिए करता है। इस पाठ में राम साहस, शक्ति और विनम्रता के संगम हैं, जबकि परशुराम में केवल साहस और शक्ति है, विनम्रता का अभाव है। राम की विनम्रता के आगे परशुराम का क्रोध और अहंकार भी टिक नहीं पाया। इसलिए सच्चा वीर वही है जिसमें साहस और शक्ति के साथ-साथ विनम्रता भी हो।
1. बिहसि लखनु बोले मृदु बानी। अहो मुनीसु महाभट मानी | |
पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू। चहत उड़ावन फूँकि पहारू | |
उत्तर:-
प्रसंग: यह पंक्तियाँ तुलसीदास कृत 'रामचरितमानस' से ली गई हैं, जहाँ लक्ष्मण परशुराम की धमकियों का जवाब दे रहे हैं।
भाव: लक्ष्मण मुस्कुराते हुए कोमल वाणी में परशुराम पर व्यंग्य करते हुए कहते हैं - हे मुनिश्रेष्ठ! आप स्वयं को बहुत बड़ा योद्धा मानते हैं और बार-बार मुझे अपना फरसा दिखाकर डरा रहे हैं। मानो आपकी एक फूँक से पहाड़ उड़ जाएगा! अर्थात्, जिस तरह फूँक से पहाड़ नहीं उड़ता, उसी तरह मुझे एक बालक समझकर आपके इस फरसे से डरना व्यर्थ है।
2. इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं। जे तरजनी देखि मरि जाहीं | |
देखि कुठारु सरासन बाना। मैं कछु कहा सहित अभिमाना | |
उत्तर:-
प्रसंग: यह पंक्तियाँ तुलसीदास कृत 'रामचरितमानस' से हैं, जहाँ लक्ष्मण परशुराम को अपनी वीरता का अहसास करा रहे हैं।
भाव: लक्ष्मण कहते हैं कि हे परशुराम! यहाँ कोई 'कुम्हड़बतिया' (छुई-मुई का पौधा) नहीं है जो आपकी उँगली (तर्जनी) देखकर मुरझा जाए। हम बालक अवश्य हैं, किंतु फरसे, धनुष और बाण भी हमने बहुत देखे हैं। इसलिए हमें नादान समझकर अपनी वीरता का बखान करना बंद कीजिए। हम आपकी धमकियों से भयभीत नहीं हैं।
3. गाधिसनु कह हृदय हसि मुनिहि हरियरे सूझ।
अयमय खाँड़ न ऊखमय अजहूँ न बूझ अबूझ | |
उत्तर:-
प्रसंग: यह पंक्तियाँ तुलसीदास कृत 'रामचरितमानस' से हैं, जहाँ विश्वामित्र मन ही मन परशुराम की स्थिति पर टिप्पणी कर रहे हैं।
भाव: विश्वामित्र मन ही मन हँसते हुए सोचते हैं कि गाधिपुत्र (परशुराम) को अभी क्रोध और अहंकार के कारण चारों ओर केवल हरियाली (सतही दृश्य) ही दिख रही है। वे राम-लक्ष्मण को गन्ने की मीठी खाँड़ (निर्बल) समझ रहे हैं, जबकि वे तो लोहे की तलवार (अत्यंत बलवान) के समान हैं। परशुराम की स्थिति सावन के अंधे की तरह हो गई है, जिसे हर चीज हरी ही दिखती है। वे अभी तक इस भ्रम में हैं और सच्चाई को नहीं समझ पा रहे।
उत्तर:- इस पाठ के आधार पर तुलसीदास जी के भाषा सौंदर्य की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं -
1. तुलसीदास की भाषा अवधी है, जो सरल, मधुर और हृदयस्पर्शी है।
2. उन्होंने दोहा और चौपाई छंदों का सुंदर प्रयोग किया है, जिससे भाषा में लयात्मकता आई है।
3. भाषा में अनुप्रास अलंकार की छटा सर्वत्र बिखरी है, जैसे - 'बालकु बोलि बधधौं'।
4. उपमा अलंकार के प्रयोग से भाव स्पष्ट और सजीव हुए हैं, जैसे - 'कोटि कुलिस सम बचनु'।
5. रूपक अलंकार के माध्यम से अर्थ गहराई प्राप्त करता है, जैसे - 'रघुकुलभानु'।
6. व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग लक्ष्मण के संवादों में विशेष रूप से हुआ है, जो पाठ को रोचक बनाता है।
7. भाषा में मुहावरेदार प्रयोग एवं लोकजीवन के शब्दों का समावेश है।
8. संवादात्मक शैली के कारण पात्रों के चरित्र और भाव स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आते हैं।
9. भाषा में प्रवाह है और वह सामान्य जन तक आसानी से पहुँचने वाली है।
10. कोमल एवं कठोर, दोनों प्रकार के भावों को व्यक्त करने की अद्भुत क्षमता तुलसी की भाषा में है।
उत्तर:- इस पूरे प्रसंग में लक्ष्मण के माध्यम से व्यंग्य का बहुत सुंदर और प्रभावी प्रयोग हुआ है। कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं -
1. "बहु धनुही तोरी लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥"
व्यंग्य: लक्ष्मण कहते हैं कि बचपन में हमने बहुत से धनुष तोड़े, पर किसी ने क्रोध नहीं किया। यहाँ वे परशुराम के अत्यधिक क्रोध पर व्यंग्य करते हुए कह रहे हैं कि यह धनुष कोई विशेष नहीं है, आप बेवजह रोष कर रहे हैं।
2. "इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं। जे तरजनी देखि मरि जाहीं॥"
व्यंग्य: लक्ष्मण कहते हैं कि यहाँ कोई छुई-मुई का पौधा नहीं है जो आपकी उँगली देखकर मुरझा जाए। यहाँ वे परशुराम की धमकी भरी अंगुली और उनके अहंकार पर करारा व्यंग्य कर रहे हैं कि हम आपसे डरने वाले नहीं हैं।
3. "पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू। चहत उड़ावन फूँकि पहारू॥"
व्यंग्य: लक्ष्मण कहते हैं कि आप बार-बार मुझे फरसा दिखाकर डराना चाहते हैं, मानो फूँक मारते ही पहाड़ उड़ जाएगा। यहाँ वे परशुराम की शक्ति के प्रदर्शन को अतिशयोक्तिपूर्ण और हास्यास्पद बता रहे हैं।
1. बालकु बोलि बधधौं नहि तोही।
उत्तर: अनुप्रास अलंकार - इसमें 'ब' वर्ण की बार-बार आवृत्ति हुई है ('बालकु', 'बोलि', 'बधधौं')।
2. कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा।
उत्तर: (i) अनुप्रास अलंकार - 'क' वर्ण की आवृत्ति ('कोटि', 'कुलिस')।
(ii) उपमा अलंकार - परशुराम के वचनों की तुलना कोटि (करोड़ों) वज्रों के समान की गई है। 'सम' शब्द उपमा का सूचक है।
3. तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा। बार बार मोहि लागि बोलावा॥
उत्तर: (i) उत्प्रेक्षा अलंकार - 'कालु हाँक जनु लावा' में उत्प्रेक्षा है। यहाँ 'जनु' शब्द उत्प्रेक्षा का वाचक है। अर्थात् ऐसा प्रतीत होता है मानो आप स्वयं यमराज को हाँककर ला रहे हैं।
(ii) पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार - 'बार बार' में पुनरुक्ति है क्योंकि 'बार' शब्द की दो बार आवृत्ति हुई है और अर्थ में कोई भिन्नता नहीं है।
4. लखन उतर आहुति सरिस भृगुबरकोपु कृसानु। बढ़त देखि जल सम बचन बोले रघुकुलभानु॥
उत्तर: (i) उपमा अलंकार -
a) 'उतर आहुति सरिस भृगुबरकोपु कृसानु' - परशुराम के क्रोध की तुलना आहुति पाकर बढ़े हुए अग्नि (कृसानु) से की गई है। 'सरिस' उपमा सूचक शब्द है।
b) 'जल सम बचन' - राम के वचनों की तुलना जल के समान शीतलता प्रदान करने वाले बताया गया है।
(ii) रूपक अलंकार - 'रघुकुलभानु' में रूपक अलंकार है। रघुकुल को दिन (दिवस) माना गया है और राम को उसका सूर्य (भानु) बताया गया है। अर्थात् राम रघुकुल के सूर्य हैं।
उत्तर:-
पक्ष में विचार: क्रोध एक स्वाभाविक मानवीय भाव है और न्याय व सुधार के लिए यह आवश्यक भी हो सकता है। जब कोई अन्याय होता है, तो उसके विरुद्ध आवाज उठाने के लिए एक प्रकार का सकारात्मक क्रोध ही तो प्रेरित करता है। एक शिक्षक का विद्यार्थी की लापरवाही पर क्रोध उसे सुधारने के लिए होता है। समाज में फैली बुराइयों के खिलाफ लड़ने के लिए भी क्रोध एक ऊर्जा देता है। अतः न्याय, सुधार और परिवर्तन के लिए नियंत्रित क्रोध सकारात्मक भूमिका निभा सकता है।
विपक्ष में विचार: क्रोध अक्सर विवेक को ढक लेता है और व्यक्ति को गलत निर्णय लेने पर मजबूर कर देता है। क्रोध में लिया गया कोई भी कदम आमतौर पर विनाशकारी ही होता है। यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, रिश्तों को तोड़ता है और मानसिक शांति भंग करता है। जैसा कि इस पाठ में दिखता है, परशुराम का क्रोध उन्हें एक बालक से विवाद करने पर उतारू कर देता है। अतः क्रोध पर नियंत्रण रखना और धैर्य से काम लेना ही बुद्धिमानी है। क्रोध के बजाय शांत चित्त से समस्या का समाधान ढूँढ़ना अधिक प्रभावी होता है।
उत्तर:- यदि मैं स्वयं को इस परिस्थिति में रखूँ, तो मेरा व्यवहार श्री राम और लक्ष्मण के बीच का होता। लक्ष्मण की तरह मैं भी परशुराम के अहंकार और अनुचित क्रोध को चुपचाप सहन नहीं कर पाता। मैं उन्हें यह जरूर समझाने का प्रयास करता कि धनुष टूटना एक दुर्घटना थी और इसमें राम का कोई दोष नहीं है। हालाँकि, लक्ष्मण की तरह तीखे व्यंग्य और उपहास का सहारा लेने के बजाय, मैं राम की तरह विनम्रता बनाए रखते हुए, लेकिन दृढ़ता के साथ, अपनी बात रखने का प्रयास करता। मेरा उद्देश्य विवाद को बढ़ाना नहीं, बल्कि गलतफहमी दूर करना और स्थिति को शांत करना होता।
उत्तर:- मेरी एक सहेली नेहा का स्वभाव इस पाठ के पात्रों की याद दिलाता है। उसके स्वभाव की मुख्य विशेषताएँ हैं -
1. साहसी एवं निडर: वह किसी भी अन्याय के सामने चुप नहीं रहती, ठीक लक्ष्मण की तरह। कक्षा में किसी के साथ गलत होते देख वह तुरंत आवाज उठाती है।
2. व्यंग्यात्मक समझदारी: गलत बात का विरोध करते समय वह कभी-कभी हल्के-फुल्के व्यंग्य का सहारा लेती है, जिससे सामने वाला उलझ नहीं पाता और बात भी समझ जाता है।
3. विनम्रता: लक्ष्मण के विपरीत, नेहा में राम जैसी विनम्रता भी है। वह बड़ों का आदर करती है और अपनी बात अक्सर शालीनता से रखती है।
4. सहायक प्रवृत्ति: वह हमेशा दूसरों की मदद के लिए तैयार रहती है, चाहे पढ़ाई हो या कोई व्यक्तिगत समस्या।
उसका यह मिला-जुला स्वभाव उसे हम सबके बीच बहुत सम्मान दिलाता है।
उत्तर:-
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