UP Board Class 10 Hindi 13. प्रहलाद अग्रवाल is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. Class 10 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
उत्तर:- 'तीसरी कसम' फ़िल्म को 'सैल्यूलाइड पर लिखी कविता' इसलिए कहा गया है क्योंकि यह एक साधारण मनोरंजन की फिल्म न होकर एक कोमल काव्यात्मक अनुभूति थी। जिस प्रकार कविता भावनाओं और संवेदनाओं को शब्दों में पिरोती है, उसी प्रकार इस फिल्म ने हीरामन और हीराबाई की मार्मिक कहानी को दृश्यों और संगीत के माध्यम से कविता की तरह प्रस्तुत किया था।
उत्तर:- 'तीसरी कसम' फ़िल्म को खरीददार इसलिए नहीं मिल रहे थे क्योंकि वह उस समय की रूढ़िवादी व्यावसायिक फिल्मों से बिल्कुल अलग थी। इसमें न तो अनावश्यक मसाला था और न ही सनसनीखेज दृश्य। फिल्म वितरकों को लगता था कि यह शुद्ध साहित्यिक फिल्म आम दर्शकों की समझ से परे है और इससे मुनाफा नहीं होगा, इसलिए कोई भी इसे खरीदने व जोखिम उठाने को तैयार नहीं था।
उत्तर:- शैलेंद्र के अनुसार एक सच्चे कलाकार का मुख्य कर्तव्य यह है कि वह दर्शकों की रुचि का परिष्कार यानी सुधार और उन्नति करे। कलाकार को दर्शकों की मांग के नाम पर सस्ता और उथला मनोरंजन परोसने के बजाय, ऐसी कला का सृजन करना चाहिए जो उनके मन को ऊंचा उठाए और उनकी संवेदनशीलता को बढ़ाए।
उत्तर:- फिल्मों में दुखद या त्रासद स्थितियों को बढ़ा-चढ़ाकर (ग्लोरिफाई) इसलिए दिखाया जाता है ताकि दर्शकों की भावनाओं का शोषण कर उन्हें अधिक से अधिक आकर्षित किया जा सके। इस तरह की अतिशयोक्ति से दर्शकों का ध्यान खींचा जाता है और फिल्म को व्यावसायिक सफलता मिलने की संभावना बढ़ जाती है।
उत्तर:- इस कथन का अर्थ है कि राजकपूर अपनी फिल्मों में आँखों के भावों (आँखों से बात करने) के माध्यम से जो कुछ कहना चाहते थे, गीतकार शैलेंद्र ने अपने सरल, भावपूर्ण और मार्मिक गीतों के शब्दों में उसे पूरी तरह व्यक्त कर दिया। शैलेंद्र के गीत राजकपूर के अभिनय में छिपी भावनाओं को आवाज देते थे और कहानी को और गहराई प्रदान करते थे।
उत्तर:- शोमैन वह व्यक्ति होता है जो अपने आकर्षक व्यक्तित्व, शानदार प्रस्तुति और अद्भुत कला के बल पर जनता के दिलों पर राज करता है। ऐसा कलाकार अपने नाम मात्र से ही दर्शकों को सिनेमाघर की ओर खींच लाता है। राजकपूर ने अपनी फिल्मों और चमत्कारी अभिनय से पूरे एशिया में ऐसी ही पहचान बनाई थी, इसीलिए लेखक ने उन्हें एशिया का सबसे बड़ा शोमैन कहा है।
उत्तर:- संगीतकार जयकिशन ने इस गीत की पंक्ति 'दसों दिशाओं' पर आपत्ति जताई क्योंकि उनका मानना था कि आम दर्शक केवल चार दिशाओं (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण) से ही परिचित होते हैं। उन्हें लगा कि 'दस दिशाओं' (जिसमें ऊपर-नीचे, ईशान, नैऋत्य आदि भी शामिल हैं) जैसा साहित्यिक और दार्शनिक शब्द प्रयोग करने से दर्शक गीत से जुड़ाव महसूस नहीं कर पाएंगे। हालाँकि, बाद में यह गीत बहुत लोकप्रिय हुआ।
उत्तर:- राजकपूर के चेतावनी देने के बावजूद शैलेंद्र ने 'तीसरी कसम' फिल्म इसलिए बनाई क्योंकि उनका उद्देश्य केवल धन या यश कमाना नहीं था। वे एक आदर्शवादी कवि थे जो अपनी भीतरी भावनाओं और कलात्मक संतुष्टि को सर्वोपरि मानते थे। वे एक ऐसी शुद्ध साहित्यिक फिल्म बनाना चाहते थे जो दर्शकों के मन को छू सके और उनकी संवेदनाओं को ऊंचा उठा सके, भले ही उससे व्यावसायिक नुकसान ही क्यों न हो।
उत्तर:- 'तीसरी कसम' में राजकपूर ने हीरामन की भूमिका में अपने सुपरस्टार व्यक्तित्व को पूरी तरह छुपा दिया था। उन्होंने एक सीधे-सादे, भोले-भाले गाड़ीवान के भावनात्मक संघर्ष, प्रेम, विश्वासघात और मासूमियत को इतनी सहजता और गहराई से अभिव्यक्त किया कि दर्शकों को केवल हीरामन ही दिखाई दिया, राजकपूर नहीं। यही एक महान अभिनेता की सफलता है जब वह पात्र में पूरी तरह समा जाता है।
उत्तर:- लेखक ने ऐसा इसलिए लिखा है क्योंकि 'तीसरी कसम' फिल्म, फणीश्वर नाथ 'रेणु' की मूल कहानी 'मारे गए गुलफाम' का बिल्कुल सटीक और शुद्ध रूपांतरण थी। फिल्म में कहानी के भाव, संवेदना, पात्र और परिवेश में कोई मनमाना बदलाव नहीं किया गया। पटकथा भी स्वयं रेणु जी ने लिखी थी। इस प्रकार फिल्म ने साहित्य की मूल आत्मा को बिना किसी व्यावसायिक छेड़छाड़ के पर्दे पर उतारकर उसके साथ पूरा न्याय किया।
उत्तर:- शैलेंद्र के गीतों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
उत्तर:- फिल्म निर्माता के रूप में शैलेंद्र की प्रमुख विशेषताएँ थीं:
उत्तर:- शैलेंद्र का निजी जीवन सादगी, ईमानदारी, भावुकता और सिद्धांतों से भरा हुआ था। ये सभी गुण 'तीसरी कसम' फिल्म में साफ झलकते हैं। जिस प्रकार शैलेंद्र धन-दौलत से दूर एक सीधे-साधे इंसान थे, ठीक वैसे ही फिल्म का नायक हीरामन है। हीरामन का भोलापन, सच्चा प्रेम, और सादा जीवन शैलेंद्र के अपने व्यक्तित्व का ही प्रतिबिंब लगता है। फिल्म में व्यावसायिकता का अभाव भी शैलेंद्र के इसी स्वभाव को दर्शाता है।
उत्तर:- मैं लेखक के इस कथन से पूर्णतः सहमत हूँ। 'तीसरी कसम' एक भावप्रधान और संवेदनशील फिल्म थी, जिसमें कविता जैसी कोमलता और लय थी। ऐसी फिल्म बनाने के लिए केवल तकनीकी ज्ञान या व्यावसायिक समझ काफी नहीं थी। इसके लिए एक ऐसे संवेदनशील हृदय की आवश्यकता थी जो जीवन की सूक्ष्म भावनाओं को समझता हो और उन्हें कला के माध्यम से व्यक्त कर सकता हो। शैलेंद्र एक सच्चे कवि हृदय थे, इसीलिए वे ही ऐसी अनूठी फिल्म का निर्माण कर सके।
उत्तर:- इस कथन का आशय यह है कि शैलेंद्र का स्वभाव एक आदर्शवादी और संवेदनशील कवि जैसा था। उनके लिए धन-दौलत और नाम की प्रसिद्धि ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं थी। उनकी सबसे बड़ी इच्छा यह थी कि वे अपनी भीतरी कलात्मक और भावनात्मक आकांक्षाओं को पूरा करें और उससे मिलने वाली आत्मिक खुशी या संतुष्टि को प्राप्त करें। यही कारण था कि उन्होंने 'तीसरी कसम' जैसी फिल्म बनाई।
उत्तर:- इस कथन का आशय यह है कि शैलेंद्र का दृढ़ विश्वास था कि एक सच्चे कलाकार को दर्शकों की मांग का बहाना बनाकर घटिया और सतही मनोरंजन नहीं परोसना चाहिए। बल्कि, कलाकार का असली दायित्व यह है कि वह अपनी अच्छी कला के माध्यम से दर्शकों की रुचि को परिष्कृत (सुधारे और निखारे) करे, उनके स्वाद को ऊंचा उठाए और उनमें बेहतर कला की समझ पैदा करे।
उत्तर:- इस कथन का आशय यह है कि जीवन में आने वाला दुःख या कष्ट (व्यथा) इंसान को हार मानने या टूट जाने के लिए नहीं होता। बल्कि, यह दुःख उसे जीवन की एक सीख देता है, उसे और अधिक मजबूत बनाता है और आगे बढ़ने की नई प्रेरणा देता है। संघर्ष ही सफलता की सीढ़ी है, यही संदेश इस पंक्ति में निहित है।
उत्तर:- इस कथन का आशय यह है कि 'तीसरी कसम' फिल्म की भावनात्मक गहराई और कलात्मक मूल्य को वे लोग कभी नहीं समझ सकते जो हर चीज को केवल पैसे के लेन-देन और व्यावसायिक लाभ-हानि ('दो से चार बनाने') की दृष्टि से देखते हैं। यह फिल्म भावनाओं और सिद्धांतों पर आधारित थी, न कि मुनाफे पर, इसलिए शुद्ध व्यवसायियों की समझ से बाहर थी।
उत्तर:- इस कथन का आशय यह है कि शैलेंद्र के गीत भावनाओं से परिपूर्ण (भाव-प्रवण) तो थे, लेकिन वे कठिन या समझने में दुरूह नहीं थे। उनके गीतों में गहरा भाव होते हुए भी भाषा इतनी सरल और स्पष्ट होती थी कि आम जनता भी उन्हें आसानी से समझ और महसूस कर सकती थी। उनकी रचनाओं में भाव की गहराई और शब्दों की सरलता का अद्भुत मेल था।
उत्तर:- 'तीसरी कसम' फिल्म को राष्ट्रपति स्वर्ण पदक, बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन द्वारा सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार और मास्को अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
उत्तर:- शैलेंद्र ने अपने जीवनकाल में केवल एक ही फिल्म बनाई, जिसका नाम 'तीसरी कसम' था। यह उनकी पहली और अंतिम फिल्म थी।
उत्तर:- राजकपूर द्वारा निर्देशित कुछ प्रसिद्ध फिल्मों के नाम हैं - 'आवारा', 'श्री 420', 'जागते रहो', 'संगम', 'मेरा नाम जोकर', 'सत्यम शिवम सुंदरम' और 'प्रेम रोग' आदि।
उत्तर:- 'तीसरी कसम' फिल्म के नायक राजकपूर थे, जिन्होंने 'हीरामन' नामक एक गाड़ीवान की भूमिका निभाई। नायिका वहीदा रहमान थीं, जिन्होंने 'हीराबाई' नामक एक नौटंकी कलाकार का पात्र अदा किया।
उत्तर:- फिल्म 'तीसरी कसम' का निर्माण प्रसिद्ध गीतकार शैलेंद्र ने किया था, जो इस फिल्म के निर्माता भी थे।
उत्तर:- राजकपूर ने 'मेरा नाम जोकर' फिल्म बनाते समय इस बात की कल्पना भी नहीं की थी कि इस फिल्म के केवल पहले भाग को पूरा करने में ही उन्हें लगभग छह वर्षों का लंबा समय लग जाएगा।
उत्तर:- जब राजकपूर ने 'तीसरी कसम' फिल्म में काम करने के लिए अपना पारिश्रमिक पहले ही (एडवांस) में मांगा, तो मित्रता और कला के प्रति शैलेंद्र के आदर्शवादी दृष्टिकोण के कारण इस बात पर उनका चेहरा मुरझा गया।
उत्तर:- समीक्षक राजकपूर को एक कला के गहरे ज्ञाता (मर्मज्ञ) और 'आँखों से बात करने वाला' असाधारण कलाकार मानते थे, जो बिना शब्दों के केवल अपने चेहरे के भावों से ही पूरी बात कह देता था।
(क) राजकपूर ने एक अच्छे और सच्चे मित्र से शैलेंद्र को फ़िल्म की असफलता के खतरों से आगाह भी किया।
(यहाँ पहला 'से' साधन/अवस्था बता रहा है, दूसरा 'से' खतरे के स्रोत को दर्शा रहा है।)
(ख) रातें दसों दिशाओं से कहेंगी अपनी कहानियाँ।
(यहाँ 'से' दिशा के स्रोत या माध्यम को बता रहा है।)
(ग) फ़िल्म इंडस्ट्री में रहते हुए भी वहाँ के तौर-तरीकों से नावाकिफ थे।
(यहाँ 'से' अज्ञानता के विषय को दर्शा रहा है।)
(घ) दरअसल इस फ़िल्म की संवेदना किसी दो से चार बनाने के गणित जानने वाले की समझ से परे थी।
(यहाँ पहला 'से' गणितीय क्रिया का सूचक है, दूसरा 'से' तुलना या सीमा बता रहा है।)
(ङ) शैलेंद्र राजकपूर की इस याराना दोस्ती से परिचित तो थे।
(यहाँ 'से' परिचय के स्रोत को बता रहा है।)
(क) 'तीसरी कसम' फ़िल्म नहीं, सैल्यूलाइड पर लिखी कविता थी। UP Board Class 10 Hindi 13. प्रहलाद अग्रवाल Solution is available at our platform https://upboardSolution.com in hindi medium for free of cost. Content provided on our website is free of cost and in PDF format which is easily available for download. Getting the UP Board Solutions for Class 10 will help student to achieve good learning experience so that they can study effectively. UP board holds examination of more than 3 million students every year and majority of the question of exams are from their UP Board Solutions. That’s why it is important to study using the textSolution issued by UP Board. It is essential to know the importance of UP Board Class 10 Hindi 13. प्रहलाद अग्रवाल textSolution issued by UP Board because students completely rely on these Solutions for their study and syllabus offered by UP Board is so balanced that each student should be aware about the importance of it. Below is the list of Importance of UP Board Class 10 Hindi 13. प्रहलाद अग्रवाल :
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(यहाँ विरोधाभास या नकारात्मक पहलू ('नहीं') देकर फिर सकारात्मक और मजबूत बात ('कविता थी') कही गई है।)
(ख) उन्होंने ऐसी फ़िल्म बनाई थी जिसे सच्चा कवि-हृदय ही बना सकता था।
(यह एक जटिल वाक्य है जिसमें मुख्य उपवाक्य ('उन्होंने...बनाई थी') के बाद 'जिसे' से सापेक्ष उपवाक्य जुड़ा है, जो फिल्म की विशेषता बता रहा है।)
(ग) फ़िल्म कब आई, कब चली गई, मालूम ही नहीं पड़ा।
(यहाँ दो प्रश्नवाचक खंड ('कब आई, कब चली गई') एक साथ जुड़े हैं और फिर उनके उत्तर को 'मालूम नहीं पड़ा' से जोड़कर एक विशेष प्रभाव पैदा किया गया है।)
(घ)
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