UP Board Class 10 Hindi 3. किं किम् उपादेयम् is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. Class 10 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
हिंदी अनुवाद: भगवन! ग्रहण करने योग्य क्या है? गुरु के वचन। त्यागने योग्य क्या है? बुरा कार्य। गुरु कौन है? तत्त्वों को जानने वाला तथा निरन्तर शिष्यहित में तैयार रहने वाला।
अन्वय: भगवन् किम् उपादेयम्? गुरुवचनम्। हेयम् अपि च किम्? अकार्यम्। को गुरुः? अधिगततत्त्वः शिष्यहिताय उद्यतः सततम्॥
मञ्जूषा से रिक्त स्थान भरिए: उपादेयम्, हेयम्, गुरुः, उद्यतः।
उत्तर: (i) उपादेयम् (ii) हेयम् (iii) गुरुः (iv) उद्यतः।
शब्दार्थ:
उपादेयम् – ग्राह्यम्, ग्रहण करने योग्य।
हेयम् – त्याज्यम्, त्यागने योग्य।
सततम् – निरन्तरम्, लगातार।
अधिगततत्त्वः – तत्त्वानां ज्ञाता, तत्त्वों को जानने वाला।
संस्कृत में भावार्थ: भगवन्! क्या ग्रहण करने योग्य है? गुरु का वचन। क्या त्यागने योग्य है? बुरा कार्य। गुरु कौन है? जो तत्त्वज्ञानी है और शिष्य के हित के लिए सदैव तत्पर रहता है।
प्रश्नोत्तर:
(क) एकपदेन उत्तरत-
(i) हेयम् किम्? उत्तर: अकार्यम्।
(ii) अत्र किम् सम्बोधनपदम्? उत्तर: भगवन्।
(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत-
(i) उपादेयम् किम् भवति? उत्तर: उपादेयम् गुरुवचनं भवति।
(ii) गुरुः कः कथ्यते? उत्तर: सः गुरुः अस्ति यः अधिगततत्त्वः शिष्यहिताय च सततम् उद्यतः अस्ति।
(ग) भाषिककार्यम्-
(i) ‘निरन्तरम्’ इत्यस्य शब्दस्य अर्थ श्लोके किं पद प्रयुक्तम्? उत्तर: (क) सततम्
(ii) ‘तत्परः’ इति पदस्य अत्र पर्याय प्रयुक्तम्? उत्तर: (घ) उद्यतः
(iii) ‘उपादेयम्’ इति पदस्य विलोमपद अत्र किम्? उत्तर: (ख) हेयम्
(iv) ‘शिष्यहितायोद्यतः’ इति पदस्य सन्धिविच्छेदं कृत्वा लिखत। उत्तर: (ग) शिष्यहिताय + उद्यतः
प्रश्ननिर्माणम्:
(i) गुरुवचनम् उपादेयं भवति। प्रश्न: किम् उपादेयम्?
(ii) अकार्य हेयम् अस्ति। प्रश्न: कीदृशम् हेयम्?
(iii) गुरुः शिष्याणां हिताय तत्परः भवति। प्रश्न: कः तत्परः?
(iv) यः तत्त्वानि जानाति सः गुरुः अस्ति। प्रश्न: कः गुरुः?
हिंदी अनुवाद: अधिक कल्याणकारी क्या है? धर्म। इस संसार में पवित्र कौन है? जिसका मन शुद्ध है। पण्डित कौन है? विवेकवान्। विष क्या है? गुरुओं की अवहेलना।
अन्वय: कः पथ्यतरः? धर्मः। कः शुचिः इह? यस्य मानसं शुद्धम्। कः पण्डितः? विवेकी। किं विषम्? अवधीरणा गुरुषु॥
मञ्जूषा से रिक्त स्थान भरिए: धर्मः, मानसं, विवेकी, गुरुषु।
उत्तर: (i) धर्मः (ii) मानसं (iii) विवेकी (iv) गुरुषु।
शब्दार्थ:
इह – अस्मिन् लोके, इस संसार में।
शुचिः – पवित्रः, पवित्र।
अवधीरणा – तिरस्कारः, अपमान।
पथ्यतरः – कल्याणकरः, अधिक कल्याणकारी।
विवेकी – विवेकवान्, बुद्धिमान।
संस्कृत में भावार्थ: सबसे अधिक कल्याणकारी क्या है? धर्म। इस लोक में पवित्र कौन है? जिसका मन शुद्ध है। पण्डित कौन है? विवेकी। विष क्या है? गुरुओं का अपमान।
प्रश्नोत्तर:
(क) एकपदेन उत्तरत-
(i) पण्डितः कः? उत्तर: विवेकी।
(ii) विषं किम्? उत्तर: अवधीरणा।
(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत-
शुचिः कः भवति? उत्तर: यस्य मानसं शुद्धं भवति सः शुचिः भवति।
(ग) भाषिककार्यम्-
(i) ‘शुचिरिह’ अत्र सन्धि-विच्छेदं कुरुत। उत्तर: (ख) शुचिः + इह
(ii) ‘शुद्धं मानसम्’ इति अनयोः पदयोः विशेष्यपद किम्? उत्तर: (क) मानसम्
(iii) ‘विवेकी’ इति पदे कः प्रत्ययः? उत्तर: (क) इन्
(iv) अस्मिन् श्लोके अव्ययपदम् किम्? उत्तर: (घ) इह
प्रश्ननिर्माणम्:
(i) धर्मः पथ्यतरः भवति। प्रश्न: कः पथ्यतरः?
(ii) शुचेः मानसं शुद्धं भवति। प्रश्न: कस्य मानसं शुद्धम्?
(iii) विवेकी पण्डितः भवति। प्रश्न: कः पण्डितः?
(iv) गुरुषु अपमान विषमिव वर्तते। प्रश्न: किम् विषमिव?
(v) गुरूणाम् अवधीरणा विषमिव घातकः वर्तते। प्रश्न: केषाम् अवधीरणा?
हिंदी अनुवाद: जीवन क्या है? कलंकरहित। मूर्खता क्या है? पढ़ते हुए भी अभ्यास न करना। जागता कौन है? विवेकवान्। निद्रा क्या है? प्राणी की मूर्खता।
अन्वय: किं जीवितम्? अनवद्यम्। किं जाड्यम्? पाठतः अपि अनभ्यासः। को जागर्ति? विवेकी। का निद्रा? मूढता जन्तोः॥
मञ्जूषा से रिक्त स्थान भरिए: अनवद्यम्, पाठतः, जागर्ति, जन्तोः।
उत्तर: (i) अनवद्यम् (ii) पाठतः (iii) जागर्ति (iv) जन्तोः।
शब्दार्थ:
अनवद्यम् – अनिन्दनीयम्, निर्दोष जीवन।
जाड्यम् – मूर्खता, बुद्धिहीनता।
जागर्ति – जागरूकः भवति, सचेत रहता है।
मूढता – मूर्खता, अज्ञान।
जन्तोः – प्राणिनः, जीव की।
संस्कृत में भावार्थ: सच्चा जीवन क्या है? निर्दोष जीवन। मूर्खता क्या है? पढ़कर भी अभ्यास न करना। कौन जागृत है? विवेकी। निद्रा क्या है? प्राणी की मूर्खता।
प्रश्नोत्तर:
(क) एकपदेन उत्तरत-
(i) जीवितम् किम्? उत्तर: अनवद्यम्।
(ii) अत्र कति प्रश्नाः सन्ति? उत्तर: चत्वारः।
(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत-
जाड्यम् किम् भवति? उत्तर: पाठतः अपि अनभ्यासः जाड्यम् भवति।
(ग) भाषिककार्यम्-
(i) ‘विवेकी’ पदे कः प्रत्ययः? उत्तर: (ख) इन्
(ii) ‘न अवद्यम्’ इति स्थाने किं पद प्रयुक्तम्? उत्तर: (क) अनवद्यम्
(iii) ‘मूर्खता’ इति पदस्य पर्यायपदं किम्? उत्तर: (घ) मूढता
(iv) ‘जन्तोः’ इति पदे का विभक्तिः? उत्तर: (ग) षष्ठी
(v) ‘शेते’ इति पदस्य विपर्ययपदं किम्? उत्तर: (ख) जागर्ति
प्रश्ननिर्माणम्:
(i) जन्तोः मूढता निद्रा भवति। प्रश्न: कस्य मूढता?
(ii) पठनस्य अनभ्यासः एव जाड्यम् अस्ति। प्रश्न: किम् जाड्यम्?
(iii) विवेकी एव सदैव जागर्ति। प्रश्न: कः जागर्ति?
(iv) अनिन्दितः एव सदा जीवति। प्रश्न: कः/कीदृशः जीवति?
(v) सदैव पठितस्य अभ्यासः कर्तव्यः। प्रश्न: कः कर्तव्यः?
हिंदी अनुवाद: कमलिनी के पत्ते पर पड़े हुए जल के समान चंचल क्या है? यौवन, धन और आयु। फिर बताओ चन्द्रमा की किरणों के समान (शीतल) कौन है? सज्जन ही।
अन्वय: नलिनीदलगतजलवत् तरलं किम्? यौवनं धनं च आयुः। पुनः कथय के शशिनः किरणसमाः? सज्जनाः एव॥
मञ्जूषा से रिक्त स्थान भरिए: जलवत्, धनम्, शशिनः, सज्जनाः।
उत्तर: (i) जलवत् (ii) धनम् (iii) शशिनः (iv) सज्जनाः।
शब्दार्थ:
नलिनीदलगतजलवत् – कमलपत्रस्थितजलवत्, कमल के पत्ते पर स्थित जल की तरह।
तरलम् – चञ्चलम्, अस्थिर।
शशिनः – चन्द्रस्य, चन्द्रमा के।
किरणसमाः – किरणैः समानाः, किरणों के समान शीतल।
सज्जनाः – साधवः, अच्छे लोग।
संस्कृत में भावार्थ: कमलपत्र पर स्थित जल की भाँति अस्थिर क्या है? यौवन, धन और आयु। पुनः बताइए, चन्द्रमा की किरणों के समान शीतल कौन हैं? केवल सज्जन ही।
प्रश्नोत्तर:
(क) एकपदेन उत्तरत-
(i) सज्जनाः कीदृशाः भवन्ति? उत्तर: शशिकिरणसमाः।
(ii) के शशिनः किरणसमाः? उत्तर: सज्जनाः।
(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत-
नलिनीदलगतजलवत्तरलं किम्? उत्तर: नलिनीदलगतजलवत्तरलं यौवनं धनं आयुः च भवति।
(ग) भाषिककार्यम्-
(i) ‘कथय’ पदे कः लकारः? उत्तर: (ख) लोट् लकारः
(ii) ‘आयुः’ इति पदम् कस्मिन् लिङ्गे अस्ति? उत्तर: (ग) नपुंसकलिङ्गे
(iii) ‘शशिनः’ पदे का विभक्तिः? उत्तर: (घ) षष्ठी
(iv) ‘दलम्’ इति पदस्य अर्थम् प्रसंगानुसारम् अस्ति- उत्तर: (क) पत्रम्
प्रश्ननिर्माणम्:
(i) सज्जनाः शशिकिरणसमाः भवन्ति। प्रश्न: कीदृशाः भवन्ति?
(ii) शशिनः किरणाः शीतलाः भवन्ति। प्रश्न: कीदृशाः भवन्ति?
(iii) यौवनं तरलं भवति। प्रश्न: किं तरलम्?
(iv) धनं चञ्चलं भवति। प्रश्न: किं चञ्चलम्?
(v) आयुः अस्थिरा कथ्यते। प्रश्न: कस्याः अस्थिरता?
हिंदी अनुवाद: अनर्थकारी फल देने वाला कौन है? अभिमान। सुखदायी कौन है? सज्जनों की मित्रता। सभी बुराइयों का नाश करने में समर्थ कौन है? सब प्रकार से त्याग करने वाला।
अन्वय: कः अनर्थफलः? मानः। का सुखदा? साधुजनमैत्री। सर्वव्यसनविनाशे कः दक्षः? सर्वथा त्यागी॥
मञ्जूषा से रिक्त स्थान भरिए: मानः, मैत्री, दक्षः, त्यागी।
उत्तर: (i) मानः (ii) मैत्री (iii) दक्षः (iv) त्यागी।
शब्दार्थ:
अनर्थफलः – अनर्थस्य कारकः, अनर्थ का कारण बनने वाला।
दक्षः – निपुणः, कुशल।
मैत्री – मित्रता, स्नेह।
साधुजनः – सज्जनः, अच्छे लोग।
सर्वथा – सर्वप्रकारेण, पूरी तरह से।
त्यागी – त्यागशीलः, त्याग करने वाला।
संस्कृत में भावार्थ: कौन अनर्थ का कारण बनता है? अभिमान। क्या सुख देने वाली है? सज्जनों की मित्रता। सभी दुर्गुणों के विनाश में कौन कुशल है? पूर्णतः त्यागी व्यक्ति।
प्रश्नोत्तर:
(क) एकपदेन उत्तरत-
(i) कः अनर्थफलः? उत्तर: मानः।
(ii) का सुखदा? उत्तर: साधुजनमैत्री।
(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत-
सुखदा का? उत्तर: सुखदा साधुजनमैत्री भवति।
(ग) भाषिककार्यम्-
(i) ‘त्यागी’ पदे कः प्रत्ययः? उत्तर: (क) इन्
(ii) ‘सुखं ददाति इति या सा’ इति स्थाने किं पद प्रयुक्तम्? उत्तर: (ग) सुखदा
(iii) ‘त्यागी’ इति पदे कः मूलशब्दः? उत्तर: (ख) त्याग
(iv) अस्मिन् श्लोके अव्ययपदं किम्? उत्तर: (घ) सर्वथा
प्रश्ननिर्माणम्:
(i) साधुजनमैत्री सुखदा भवति। प्रश्न: कीदृशी भवति?
(ii) मानः एव अनर्थफलः अस्ति। प्रश्न: कः अनर्थफलः?
(iii) दक्षस्य अर्थः कुशलोऽस्ति। प्रश्न: कस्य अर्थः?
(iv) त्यागी एव सर्वव्यसनविनाशं करोति। प्रश्न: कः करोति?
(v) अहंकारी जनः अहंकारं प्राप्नोति। प्रश्न: किम् प्राप्नोति?
हिंदी अनुवाद: मृत्यु क्या है? मूर्खता। बहुमूल्य क्या है? जो उचित समय पर दे दिया जाए। मृत्यु तक काँटे की तरह चुभने वाला क्या है? जो पाप छिपकर किया गया हो।
अन्वय: किं मरणम्? मूर्खत्वम्। किं च अनर्घम्? यत् अवसरे दत्तम्। आमरणात् किं शल्यम्? प्रच्छन्नं यत् कृतं पापम्॥
मञ्जूषा से रिक्त स्थान भरिए: मूर्खत्वम्, अवसरे, शल्यम्, प्रच्छन्नम्।
उत्तर: (i) मूर्खत्वम् (ii) अवसरे (iii) शल्यम् (iv) प्रच्छन्नम्।
शब्दार्थ:
अनर्घम् – बहुमूल्यम्, अमूल्य।
शल्यम् – कण्टकम्, काँटा।
मरणम् – मृत्युः, मृत्यु।
अवसरे – उचितसमये, सही समय पर।
आमरणात् – मृत्युं यावत्, मृत्यु तक।
प्रच्छन्नम् – गुप्तम्, छिपा हुआ।
संस्कृत में भावार्थ: वास्तविक मृत्यु क्या है? मूर्खता। अमूल्य क्या है? जो उचित समय पर दिया जाए। मृत्यु तक कष्ट देने वाला क्या है? वह पाप जो छिपकर किया गया हो।
प्रश्नोत्तर:
(क) एकपदेन उत्तरत-
(i) मरणम् किं भवति? उत्तर: मूर्खत्वम्।
(ii) ‘शल्यम्’ इत्यस्य शब्दस्य कः अर्थः? उत्तर: कण्टकम्।
(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत-
अनर्घं किम्? उत्तर: अनर्घम् अवसरे दत्तं भवति।
(ग) भाषिककार्यम्-
(i) ‘प्रच्छन्नम्’ इति कस्य विशेषणम्? उत्तर: (क) पापस्य
(ii) ‘मूर्खत्वम्’ पदे कः प्रत्ययः? उत्तर: (क) त्व
(iii) ‘दत्तम्’ इति पदे कः प्रत्ययः वर्तते? उत्तर: (ख) क्त
(iv) ‘न अर्घम्’ इति स्थाने किं पद प्रयुक्तम्? उत्तर: (क) अनर्घम्
प्रश्ननिर्माणम्:
(i) मूर्खत्वम् एव मरणं भवति। प्रश्न: किम् मरणम्?
(ii) अनर्घम् अवसरे दत्तं वर्तते। प्रश्न: कदा दत्तम्?
(iii) प्रच्छन्नं कृतं पापं पीडयति। प्रश्न: कथं कृतम्?
(iv) पापं मृत्युं यावत् कष्टं ददाति। प्रश्न: किम् ददाति?
हिंदी अनुवाद: प्राणिगण किसके वश में हैं? सत्य-प्रिय बोलने वाले विनम्र के। कहाँ ठहरना चाहिए? इहलोक और परलोक के लाभों से भरपूर न्याय के उचित मार्ग पर।
अन्वय: कस्य वशे प्राणिगणः? सत्यप्रियभाषिणः विनीतस्य। क्व स्थातव्यम्? न्याय्ये पथि दृष्टादृष्टलाभाढ्य
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